जुबान झूठ बोल सकती है। उसकी फितरत है। आंखों का अंदाज-ए-बयां और है। वे कम बोलती हैं। पर जब बोलती हैं-सिर्फ सच बोलती हैं। चीख-चीखकर। कुछ भी नहीं छिपातीं। सब कह देती हैं। पलक झपकते। जुबान कहती है- हम होंगे कामयाब। आंखें उसका साथ नहीं देतीं। होंठ हिल-कांपकर रह जाते हैं। एक जरा चिंता। पीड़ा। असंभव का खौफ। कल क्या होगा। उम्मीद नजर ही नहीं आती। यकीन नहीं होता। क्या यह बाईस तारीख की तस्वीर है। आने वाले कल की हकीकत। उसका पूरा फसाना।
Thursday, July 17, 2008
क्या यह बाईस तारीख की तस्वीर है?
जुबान झूठ बोल सकती है। उसकी फितरत है। आंखों का अंदाज-ए-बयां और है। वे कम बोलती हैं। पर जब बोलती हैं-सिर्फ सच बोलती हैं। चीख-चीखकर। कुछ भी नहीं छिपातीं। सब कह देती हैं। पलक झपकते। जुबान कहती है- हम होंगे कामयाब। आंखें उसका साथ नहीं देतीं। होंठ हिल-कांपकर रह जाते हैं। एक जरा चिंता। पीड़ा। असंभव का खौफ। कल क्या होगा। उम्मीद नजर ही नहीं आती। यकीन नहीं होता। क्या यह बाईस तारीख की तस्वीर है। आने वाले कल की हकीकत। उसका पूरा फसाना।
Wednesday, July 16, 2008
कामरेड... नहीं, यह लोकसभाध्यक्ष का घर
कामरेड... नहीं, नहीं, यह लोकसभाध्यक्ष का घर। इस समय शांत, निस्तब्ध। अंदर से लेकिन बेचैन-अशांत। राजनीति के अंधियारे में अंतरात्मा का झिलमिल सा दिखता-सोमनाथ-एक नाम। यह एक पद या कि महज सांसद का एक नाम। एटमी डील की राजनीति। बेहद संकरी उसकी पगडंडी। इसमें फंस गया एक बड़ा संवैधानिक डीलडौल। अंकों की गिनती को देखो तो कटारा, पप्पू यादव, अतीक, सूरजभान और वैसे ही एक सोमनाथ। मोल-तोल का बाजार गर्म। खरीद-बेच की उधेड़बुन। कैसे बचे कुछ इसकी एकला कश्मकश।
Sunday, July 13, 2008
कब कौन तिनका बन सहारा दे?
राजनीति माया का एक रूप। अनबुझ पहेली। बड़ी बेरहम। कौन दुश्मन, कौन दोस्त। पता नहीं। कल तक साथ थे। किनारे हो गए। कब कौन तिनका बन सहारा दे। करार पर। सभी बेकरार। मची है रार। असलियत से दूर। आंखें मूंदे। अनाड़ी बनने का नाटक। नाटक खूब चलता है। बिना जमाए जमता है। अपनी डफली। अपना राग। अपना हित सर्वोपरि। देशहित बेकार। बसी कुर्सी की चाहत। लेकिन जनता देख रही है। समझ रही है हकीकत। नेता एक बार चूक जाए। पर जनता नहीं चूकती। रहनुमा याद रखें तो अच्छा है।
Saturday, July 12, 2008
जब प्रेम तुम्हें बुलाए तो उसके पीछे-पीछे जाओ
'द प्राफेट' : अलमुस्तफा उसका नाम था- भाग दो...
जब प्रेम तुम्हें अपनी ओर बुलाए तो उसके पीछे-पीछे जाओ, हालांकि उसकी राहें टेढ़ी-मेढ़ी और मुश्किल हैं। जब उसके पंख तुम्हें ढंक लेना चाहें तो खुद को उसके हवाले कर दो। भले ही उन पंखों छुपी तलवार तुम्हें घायल कर दे। और वो जब तुमसे बोले तो उस पर भरोसा करो। भले ही उसकी आवाज तुम्हारे सपनों को चकनाचूर कर डाले। जसे तूफान किसी बगिया को उजाड़ डालता है। क्योंकि प्रेम जिस तरह तुम्हें मुकुट पहनाएगा, ताजपोशी करेगा, उसी तरह वो तुम्हें सूली पर भी चढ़ाएगा। वो तुम्हें पनपने देगा और तुम्हारी काट-छांट भी करता रहेगा। प्रेम जिस तरह तुम्हारी ऊंचाइयों तक चढ़कर सूरज की किरणों में कांपती हुई तुम्हारी कोमल कोंपलों की देखभाल करता है। उसी तरह वो गहराई तक उतरकर जमीन में दूर तक फैली हुई तुम्हारी जड़ों को भी झकझोर सकता है। अनाज के बालों की तरह वह तुम्हें अपने अंदर भर लेता है। तुम्हें नंगा करने के लिए कूटता है। भूसी दूर करने के लिए तुम्हें फटकता है। पीसकर तुम्हें सफेद बनाता है और नरम बनाने तक तुम्हें गूंथता है। और फिर तुम्हें अपनी पवित्र आग पर सेंकता है जिससे तुम ईश्वर की थाली की पावन रोटी बन सको। प्रेम तुम्हारे साथ ये सारा खेल इसलिए करता है ताकि तुम अपने दिल के रहस्यों को जान सको। समझ सको। और उसी समझ और ज्ञान से जिंदगी की दुनिया का एक हिस्सा बन सको। लेकिन अगर किसी डर से तुम केवल प्रेम की शांति और उसके आनंद की ही कामना करते हो वही चाहते हो तो तुम्हारे लिए भला होगा कि तुम अपना नंगापन ढक लो और प्रेम के खलिहान से बाहर निकल जाओ। ऐसी दुनिया में घर बनाओ जहां मौसम आते-जाते न हों, जहां तुम हंसो लेकिन पूरी हंसी नहीं, और रोओ तो, लेकिन पूरे आंसुओं के साथ नहीं। प्रेम किसी को अपने आपके सिवा न कुछ देता है, न किसी से अपने आप के सिवा कुछ लेता है। प्रेम न तो किसी का मालिक बनता है, न ही किसी को मालिकाना हक देता है। क्योंकि प्रेम, प्रेम में ही पूरा हो जाता है। जब तुम प्रेम करो तो ये मत कहो कि ईश्वर मेरे दिल में है बल्कि कहो कि मैं ईश्वर के दिल में हूं। और कभी न सोचना कि प्रेम का रास्ता तुम तय कर सकते हो, क्योंकि प्रेम अगर तुम्हें प्रेम के काबिल समझता है तो वो खुद तुम्हारी राह तय करता है। प्रेम खुद को पूरा करने के अलावा और कुछ नहीं चाहता। अगर तुम प्रेम करो और तुम्हारे दिल में इच्छाएं उठें ही तो वे इस तरह की इच्छाएं हो-मैं पिघल जाऊं बहते हुए झरने की तरह। रात को गीतों से भर सकूं। मैं इंतिहायी नाजुकी की तकलीफ महसूस कर सकूं। प्रेम की अपनी ही समझ से घायल हो सकूं। अपनी इच्छा से और हंसते-हंसते अपना खून बहता देख सकूं। सुबह उठूं तो दिल के डैने फैले हुए हों और प्रेम से लबरेज एक और दिन पाने के लिए शुक्रगुजार हो सकूं। दोपहर को आराम कर सकूं और प्रेम के परमानंद में डूब सकूं। दिन ढलने पर अहसानों से भरा हुआ दिल लेकर घर लौट सकूं और फिर रात में प्रिय के लिए इबादत और होठों पर उसकी तारीफ के गीत लेकर सो सकूं।
जब प्रेम तुम्हें अपनी ओर बुलाए तो उसके पीछे-पीछे जाओ, हालांकि उसकी राहें टेढ़ी-मेढ़ी और मुश्किल हैं। जब उसके पंख तुम्हें ढंक लेना चाहें तो खुद को उसके हवाले कर दो। भले ही उन पंखों छुपी तलवार तुम्हें घायल कर दे। और वो जब तुमसे बोले तो उस पर भरोसा करो। भले ही उसकी आवाज तुम्हारे सपनों को चकनाचूर कर डाले। जसे तूफान किसी बगिया को उजाड़ डालता है। क्योंकि प्रेम जिस तरह तुम्हें मुकुट पहनाएगा, ताजपोशी करेगा, उसी तरह वो तुम्हें सूली पर भी चढ़ाएगा। वो तुम्हें पनपने देगा और तुम्हारी काट-छांट भी करता रहेगा। प्रेम जिस तरह तुम्हारी ऊंचाइयों तक चढ़कर सूरज की किरणों में कांपती हुई तुम्हारी कोमल कोंपलों की देखभाल करता है। उसी तरह वो गहराई तक उतरकर जमीन में दूर तक फैली हुई तुम्हारी जड़ों को भी झकझोर सकता है। अनाज के बालों की तरह वह तुम्हें अपने अंदर भर लेता है। तुम्हें नंगा करने के लिए कूटता है। भूसी दूर करने के लिए तुम्हें फटकता है। पीसकर तुम्हें सफेद बनाता है और नरम बनाने तक तुम्हें गूंथता है। और फिर तुम्हें अपनी पवित्र आग पर सेंकता है जिससे तुम ईश्वर की थाली की पावन रोटी बन सको। प्रेम तुम्हारे साथ ये सारा खेल इसलिए करता है ताकि तुम अपने दिल के रहस्यों को जान सको। समझ सको। और उसी समझ और ज्ञान से जिंदगी की दुनिया का एक हिस्सा बन सको। लेकिन अगर किसी डर से तुम केवल प्रेम की शांति और उसके आनंद की ही कामना करते हो वही चाहते हो तो तुम्हारे लिए भला होगा कि तुम अपना नंगापन ढक लो और प्रेम के खलिहान से बाहर निकल जाओ। ऐसी दुनिया में घर बनाओ जहां मौसम आते-जाते न हों, जहां तुम हंसो लेकिन पूरी हंसी नहीं, और रोओ तो, लेकिन पूरे आंसुओं के साथ नहीं। प्रेम किसी को अपने आपके सिवा न कुछ देता है, न किसी से अपने आप के सिवा कुछ लेता है। प्रेम न तो किसी का मालिक बनता है, न ही किसी को मालिकाना हक देता है। क्योंकि प्रेम, प्रेम में ही पूरा हो जाता है। जब तुम प्रेम करो तो ये मत कहो कि ईश्वर मेरे दिल में है बल्कि कहो कि मैं ईश्वर के दिल में हूं। और कभी न सोचना कि प्रेम का रास्ता तुम तय कर सकते हो, क्योंकि प्रेम अगर तुम्हें प्रेम के काबिल समझता है तो वो खुद तुम्हारी राह तय करता है। प्रेम खुद को पूरा करने के अलावा और कुछ नहीं चाहता। अगर तुम प्रेम करो और तुम्हारे दिल में इच्छाएं उठें ही तो वे इस तरह की इच्छाएं हो-मैं पिघल जाऊं बहते हुए झरने की तरह। रात को गीतों से भर सकूं। मैं इंतिहायी नाजुकी की तकलीफ महसूस कर सकूं। प्रेम की अपनी ही समझ से घायल हो सकूं। अपनी इच्छा से और हंसते-हंसते अपना खून बहता देख सकूं। सुबह उठूं तो दिल के डैने फैले हुए हों और प्रेम से लबरेज एक और दिन पाने के लिए शुक्रगुजार हो सकूं। दोपहर को आराम कर सकूं और प्रेम के परमानंद में डूब सकूं। दिन ढलने पर अहसानों से भरा हुआ दिल लेकर घर लौट सकूं और फिर रात में प्रिय के लिए इबादत और होठों पर उसकी तारीफ के गीत लेकर सो सकूं।
Wednesday, July 9, 2008
छाड़ानगर में एक रात - भाग दो
अगर आप कभी अहमदाबाद जाएं, तो मैं गुजारिश करूंगा कि छाड़ानगर जरूर जाएं। वहां आदमी की जान की तो कोई कीमत ही नहीं। प्रतिक्रियाएं आम थीं। लोग मानने को तैयार नहीं हैं कि छाड़ा सुसंस्कृत हो सकते हैं। कला से उनका कोई संबंध है। प्रतिभा उनमें भी है। लेकिन मैंने जो देखा, उसके सामने ये प्रतिक्रियाएं बेमानी हैं।
छाड़ानगर में महाश्वेता देवी की उपस्थिति और उनका दर्जा समझ पाना कठिन नहीं था। बाद में जिन छाड़ा घरों में जाना हुआ, हर जगह दीवार पर महाश्वेता की तस्वीर थी। एक परिवार के साथ रात का खाना खाने के बाद स्थानीय लोगों में से किसी ने प्रस्ताव रखा कि मैं छाड़ानगर का एक नाटक देखूं। नाम था-बूधन। नाटककार कोई एक व्यक्ति नहीं था। समुदाय ने मिलकर उसे लिखा था। संगीत यंत्रों के नाम पर थालियां और लोटे। प्रकाश व्यवस्था के लिए एक टिमटिमाता बल्ब और दो लालटेन। बताया गया कि बिजली अक्सर चली जाती है इसलिए लालटेन जरूरी है।नाटक शुरू होने से पहले पात्रों की तलाश शुरू हुई। चार भाई इस नाटक के मुख्य कर्ताधर्ता थे। एक का नाम पूरब था, दूसरे का पश्चिम। तीसरे और चौथे उत्तर और दक्षिण थे। पता चला कि उत्तर को सुबह ही पुलिस उठा ले गई। उसकी जगह दूसरा पात्र खड़ा किया गया। बूधन की पत्नी की भूमिका पश्चिम की पत्नी ने की। नाटक में एक भूमिका महाश्वेता की भी थी। एक टेलीफोन वार्ता के जरिए। बूधन मामले में लोगों को सलाह देते हुए। बताते हुए कि उन्हें आगे क्या करना चाहिए। नाटक का पहला दृश्य विवाह के बाद बूधन और उसकी पत्नी का है। वे बाहर खाना खाते हैं। पत्नी के जिद करने पर बूधन उसे पान खिलाने ले जाता है। वहीं अचानक पुलिस पहुंचती है। बूधन को चोरी के एक मामले में गिरफ्तार करना चाहती है। दोनों इसका विरोध करते हैं। इसके बाद बूधन की पिटाई, गाली गलौज और अंत में पत्नी के सामने उसका गोलियों से भूना जाना।इसी दृश्य के बीच अचानक बिजली चली गई। पर नाटक नहीं रुका। उसी गति से चलता रहा। समझ में आया कि लालटेन इतनी जरूरी क्यों है। अभिनय की दृष्टि से ज्यादातर कलाकारों को प्रशिक्षित अभिनेताओं के समकक्ष रखा जा सकता है। संगीत अपने ढंग का बिल्कुल अनूठा। पटकथा एकदम कसी हुई। लगा कि इसे जस का तस राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में रख दिया जाए तो संभवत: पहला पुरस्कार उसे ही मिलेगा। यह समझ में आता है कि बूधन के बारे में इस नाटक में अभिनय की भाव प्रवणता इसलिए हो सकती है कि वह इसी समुदाय का था। उसकी तकलीफ सबकी साझा तकलीफ है। इसलिए अभिनय जसी कोई बात ही नहीं थी। यह जीवन था। बावजूद इसके, जीवन को मंच पर हूबहू पेश करना आसान काम नहीं है। यह निश्चित रूप से छाड़ा प्रतिभा का कमाल है।पौने दो घंटे का नाटक खत्म होने तक कोई नहीं हिला। इस बीच बिजली कई बार आयी गई। छाड़ानगर की मेहमाननवाजी चलती रही। कभी किसी के घर से चाय बनकर आती तो कभी पकौड़े। लाख मना करने पर कि हमने थोड़ी देर पहले उन्हीं के साथ खाना खाया है, कोई सुनने को तैयार नहीं था। नाटक पूरा होने के बाद अभिनेताओं ने हमसे विदा ली। और हमारे साथ एक कप चाय और पीने की जिद की। लगभग पूरा नाटक मैंने वीडियो कैमरे में रिकार्ड किया। पूरब और पश्चिम तथा पश्चिम की पत्नी वीडियो में अपना प्रदर्शन देखना चाहते थे। अगला एक घंटा उसमें लग गया। तब तक लगभग पूरा छाड़ानगर जाग रहा था। समय था रात के तीन बजे। उनके पास कहने को इतना कुछ था कि एक रात में पूरा नहीं हो सकता था। भारी मन से वे हमें कार तक छोड़ने आए।अगले दिन मैंने एक दो पत्रकारों और कुछ परिचित लोगों से पिछली रात का जिक्र किया। एक ने मुङो छूकर देखा। पूछा ‘आपको कुछ हुआ तो नहीं। पहले बताते तो पुलिस का बंदोबस्त करवा लेते। वहां जाना बिल्कुल ठीक नहीं था। कार के पहिये भी निकाल कर बेच लेते। आदमी की जान की तो कोई कीमत ही नहीं।ज् ऐसी प्रतिक्रियाएं आम थीं। वे मानने को तैयार नहीं हैं कि छाड़ा सुसंस्कृत हो सकते हैं। कला से उनका कोई संबंध है। प्रतिभा उनमें भी है। लेकिन मैंने जो देखा, उसके सामने ये प्रतिक्रियाएं बेमानी हैं। अगर आप कभी अहमदाबाद जाएं, तो मैं गुजारिश करूंगा कि छाड़ानगर जरूर जाएं।
छाड़ानगर में महाश्वेता देवी की उपस्थिति और उनका दर्जा समझ पाना कठिन नहीं था। बाद में जिन छाड़ा घरों में जाना हुआ, हर जगह दीवार पर महाश्वेता की तस्वीर थी। एक परिवार के साथ रात का खाना खाने के बाद स्थानीय लोगों में से किसी ने प्रस्ताव रखा कि मैं छाड़ानगर का एक नाटक देखूं। नाम था-बूधन। नाटककार कोई एक व्यक्ति नहीं था। समुदाय ने मिलकर उसे लिखा था। संगीत यंत्रों के नाम पर थालियां और लोटे। प्रकाश व्यवस्था के लिए एक टिमटिमाता बल्ब और दो लालटेन। बताया गया कि बिजली अक्सर चली जाती है इसलिए लालटेन जरूरी है।नाटक शुरू होने से पहले पात्रों की तलाश शुरू हुई। चार भाई इस नाटक के मुख्य कर्ताधर्ता थे। एक का नाम पूरब था, दूसरे का पश्चिम। तीसरे और चौथे उत्तर और दक्षिण थे। पता चला कि उत्तर को सुबह ही पुलिस उठा ले गई। उसकी जगह दूसरा पात्र खड़ा किया गया। बूधन की पत्नी की भूमिका पश्चिम की पत्नी ने की। नाटक में एक भूमिका महाश्वेता की भी थी। एक टेलीफोन वार्ता के जरिए। बूधन मामले में लोगों को सलाह देते हुए। बताते हुए कि उन्हें आगे क्या करना चाहिए। नाटक का पहला दृश्य विवाह के बाद बूधन और उसकी पत्नी का है। वे बाहर खाना खाते हैं। पत्नी के जिद करने पर बूधन उसे पान खिलाने ले जाता है। वहीं अचानक पुलिस पहुंचती है। बूधन को चोरी के एक मामले में गिरफ्तार करना चाहती है। दोनों इसका विरोध करते हैं। इसके बाद बूधन की पिटाई, गाली गलौज और अंत में पत्नी के सामने उसका गोलियों से भूना जाना।इसी दृश्य के बीच अचानक बिजली चली गई। पर नाटक नहीं रुका। उसी गति से चलता रहा। समझ में आया कि लालटेन इतनी जरूरी क्यों है। अभिनय की दृष्टि से ज्यादातर कलाकारों को प्रशिक्षित अभिनेताओं के समकक्ष रखा जा सकता है। संगीत अपने ढंग का बिल्कुल अनूठा। पटकथा एकदम कसी हुई। लगा कि इसे जस का तस राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में रख दिया जाए तो संभवत: पहला पुरस्कार उसे ही मिलेगा। यह समझ में आता है कि बूधन के बारे में इस नाटक में अभिनय की भाव प्रवणता इसलिए हो सकती है कि वह इसी समुदाय का था। उसकी तकलीफ सबकी साझा तकलीफ है। इसलिए अभिनय जसी कोई बात ही नहीं थी। यह जीवन था। बावजूद इसके, जीवन को मंच पर हूबहू पेश करना आसान काम नहीं है। यह निश्चित रूप से छाड़ा प्रतिभा का कमाल है।पौने दो घंटे का नाटक खत्म होने तक कोई नहीं हिला। इस बीच बिजली कई बार आयी गई। छाड़ानगर की मेहमाननवाजी चलती रही। कभी किसी के घर से चाय बनकर आती तो कभी पकौड़े। लाख मना करने पर कि हमने थोड़ी देर पहले उन्हीं के साथ खाना खाया है, कोई सुनने को तैयार नहीं था। नाटक पूरा होने के बाद अभिनेताओं ने हमसे विदा ली। और हमारे साथ एक कप चाय और पीने की जिद की। लगभग पूरा नाटक मैंने वीडियो कैमरे में रिकार्ड किया। पूरब और पश्चिम तथा पश्चिम की पत्नी वीडियो में अपना प्रदर्शन देखना चाहते थे। अगला एक घंटा उसमें लग गया। तब तक लगभग पूरा छाड़ानगर जाग रहा था। समय था रात के तीन बजे। उनके पास कहने को इतना कुछ था कि एक रात में पूरा नहीं हो सकता था। भारी मन से वे हमें कार तक छोड़ने आए।अगले दिन मैंने एक दो पत्रकारों और कुछ परिचित लोगों से पिछली रात का जिक्र किया। एक ने मुङो छूकर देखा। पूछा ‘आपको कुछ हुआ तो नहीं। पहले बताते तो पुलिस का बंदोबस्त करवा लेते। वहां जाना बिल्कुल ठीक नहीं था। कार के पहिये भी निकाल कर बेच लेते। आदमी की जान की तो कोई कीमत ही नहीं।ज् ऐसी प्रतिक्रियाएं आम थीं। वे मानने को तैयार नहीं हैं कि छाड़ा सुसंस्कृत हो सकते हैं। कला से उनका कोई संबंध है। प्रतिभा उनमें भी है। लेकिन मैंने जो देखा, उसके सामने ये प्रतिक्रियाएं बेमानी हैं। अगर आप कभी अहमदाबाद जाएं, तो मैं गुजारिश करूंगा कि छाड़ानगर जरूर जाएं।
छाड़ानगर में एक रात
पर मैं छाड़ानगर जाना चाहता था। दस हजार की आबादी वाली उस बस्ती में, जिन्हें अपराधी नगर के रूप में देखा जाता है। उनका खौफ इतना है कि रात में पुलिस भी उस बस्ती में नहीं जाती। पुलिस वैसे भी वहां तभी जाती है, जब उसे वसूली करनी होती है। छाड़ानगर में, जाहिर है, छाड़ा लोग रहते हैं। एक जनजाति, जिसे अंग्रेजों ने आपराधिक जनजाति घोषित कर दिया था। तब से यह कलंक उनके माथे पर है।
पहला भागः
छाड़ानगर को सब जानते हैं। और कोई नहीं जानता। अहमदाबाद से बिल्कुल सटा हुआ। हवाई अड्डे के रास्ते में। लेकिन सबसे कटा हुआ। कोई उस तरफ जाता ही नहीं। कुछ डर के मारे, कुछ भ्रांतियों की वजह से। छाड़ानगर का नाम लेते ही एक अजीब सी असहज स्थिति पैदा होती है। सवाल होता है कि आप वहां जाना ही क्यों चाहते हैं। पर मैं छाड़ानगर जाना चाहता था। दस हजार की आबादी वाली उस बस्ती में, जिन्हें अपराधी नगर के रूप में देखा जाता है। उनका खौफ इतना है कि रात में पुलिस भी उस बस्ती में नहीं जाती। पुलिस वैसे भी वहां तभी जाती है, जब उसे वसूली करनी होती है।
छाड़ानगर में, जाहिर है, छाड़ा लोग रहते हैं। एक जनजाति, जिसे अंग्रेजों ने आपराधिक जनजाति घोषित कर दिया था। तब से यह कलंक उनके माथे पर है। अहमदाबाद में कोई वारदात हो तो पहला शक छाड़ानगर पर जाता है। गिरफ्तारियां वहीं से होती हैं। करीब एक तिहाई आबादी इस धरपकड़ की वजह से जेल में रहती है। उनसे सवाल नहीं पूछे जाते। मान लिया जाता है कि वे अपराधी हैं। रात दस बजे मैं छाड़ानगर के बाहर था। साथ में कुछ मित्र और एक वकील। वकील साहब छाड़ा समुदाय के ही हैं। दिन में उनसे भेंट हुई थी। तभी मन बना लिया था कि छाड़ानगर जाना है। वकील अपना दुख-दर्द बता रहे थे। उन्होंने कहा ‘मैं पढ़ा लिखा हूं। वकालत की डिग्री है। अदालत से मान्यता मिली है। पर कोई मेरे पास मुकदमा लेकर नहीं आता है। मैं सिर्फ छाड़ा लोगों का वकील होकर रह गया हूं।
छाड़ानगर में स्थानीय लोगों ने हमारा स्वागत किया। दो महिलाओं ने गेंदे के फूलों की बनी माला पहनाई। हमारा पहला पड़ाव एक खस्ताहाल कमरा था। छाड़ानगर की लाइब्रेरी। पुस्तकालय में दो अखबार आते हैं। करीब पांच सौ किताबें वहां हैं। अच्छी किताबें। एक पूरा हिस्सा महाश्वेता देवी की किताबों का है। नजर पड़ी तो देखा कि वहां एक मेज पर महाश्वेता की फ्रेम में लगी तस्वीर रखी है। सामने जलती हुई अगरबत्ती। लोगों ने बताया कि महाश्वेता सचमुच की देवी हैं। उन्होंने हमारी बात की। हमारा पक्ष लिया। मुकदमा लड़ीं। वरना बूधन का मामला पुलिस ने कब का रफा-दफा कर दिया होता। उन्हीं में से एक ने स्वीकार किया कि छाड़ानगर में शराब की अवैध भट्ठियां हैं। पुलिस ने सारी अवैध भट्ठियां यहीं सीमित कर दी हैं। इससे उनकी वसूली ठीकठाक और जल्दी हो जाती है। लोगों का कहना था कि भट्ठियां उनकी मजबूरी हैं। उनके पास आमदनी का दूसरा कोई जरिया नहीं है। कोई उन्हें काम नहीं देता। झाडू पोंछे का भी नहीं।
पहला भागः
छाड़ानगर को सब जानते हैं। और कोई नहीं जानता। अहमदाबाद से बिल्कुल सटा हुआ। हवाई अड्डे के रास्ते में। लेकिन सबसे कटा हुआ। कोई उस तरफ जाता ही नहीं। कुछ डर के मारे, कुछ भ्रांतियों की वजह से। छाड़ानगर का नाम लेते ही एक अजीब सी असहज स्थिति पैदा होती है। सवाल होता है कि आप वहां जाना ही क्यों चाहते हैं। पर मैं छाड़ानगर जाना चाहता था। दस हजार की आबादी वाली उस बस्ती में, जिन्हें अपराधी नगर के रूप में देखा जाता है। उनका खौफ इतना है कि रात में पुलिस भी उस बस्ती में नहीं जाती। पुलिस वैसे भी वहां तभी जाती है, जब उसे वसूली करनी होती है।
छाड़ानगर में, जाहिर है, छाड़ा लोग रहते हैं। एक जनजाति, जिसे अंग्रेजों ने आपराधिक जनजाति घोषित कर दिया था। तब से यह कलंक उनके माथे पर है। अहमदाबाद में कोई वारदात हो तो पहला शक छाड़ानगर पर जाता है। गिरफ्तारियां वहीं से होती हैं। करीब एक तिहाई आबादी इस धरपकड़ की वजह से जेल में रहती है। उनसे सवाल नहीं पूछे जाते। मान लिया जाता है कि वे अपराधी हैं। रात दस बजे मैं छाड़ानगर के बाहर था। साथ में कुछ मित्र और एक वकील। वकील साहब छाड़ा समुदाय के ही हैं। दिन में उनसे भेंट हुई थी। तभी मन बना लिया था कि छाड़ानगर जाना है। वकील अपना दुख-दर्द बता रहे थे। उन्होंने कहा ‘मैं पढ़ा लिखा हूं। वकालत की डिग्री है। अदालत से मान्यता मिली है। पर कोई मेरे पास मुकदमा लेकर नहीं आता है। मैं सिर्फ छाड़ा लोगों का वकील होकर रह गया हूं।
छाड़ानगर में स्थानीय लोगों ने हमारा स्वागत किया। दो महिलाओं ने गेंदे के फूलों की बनी माला पहनाई। हमारा पहला पड़ाव एक खस्ताहाल कमरा था। छाड़ानगर की लाइब्रेरी। पुस्तकालय में दो अखबार आते हैं। करीब पांच सौ किताबें वहां हैं। अच्छी किताबें। एक पूरा हिस्सा महाश्वेता देवी की किताबों का है। नजर पड़ी तो देखा कि वहां एक मेज पर महाश्वेता की फ्रेम में लगी तस्वीर रखी है। सामने जलती हुई अगरबत्ती। लोगों ने बताया कि महाश्वेता सचमुच की देवी हैं। उन्होंने हमारी बात की। हमारा पक्ष लिया। मुकदमा लड़ीं। वरना बूधन का मामला पुलिस ने कब का रफा-दफा कर दिया होता। उन्हीं में से एक ने स्वीकार किया कि छाड़ानगर में शराब की अवैध भट्ठियां हैं। पुलिस ने सारी अवैध भट्ठियां यहीं सीमित कर दी हैं। इससे उनकी वसूली ठीकठाक और जल्दी हो जाती है। लोगों का कहना था कि भट्ठियां उनकी मजबूरी हैं। उनके पास आमदनी का दूसरा कोई जरिया नहीं है। कोई उन्हें काम नहीं देता। झाडू पोंछे का भी नहीं।
Tuesday, July 8, 2008
दहशतगर्दी टुकड़खोर है
दहशतगर्दी टुकड़खोर है। टुकड़ों में रहती है। टुकड़ों पर पलती है।
उसका काम है टुकड़े-टुकड़े करना। छोटे से दायरे में। बहुत सीमित दायरे में। बहुत सीमित असर के साथ। यह दायरा बड़ा भी हो भी नहीं सकता। बीच-बीच में अपनी औकात दिखाता रहता है। टुकड़खोर की औकात। पर जिंदगी दहशत पर भारी पड़ती है। हमेशा। जैसे काबुल में। तबाही हुई। लेकिन जिंदगी तबाह नहीं हुई। ललक बच गई। जिंदा रहने की। उम्मीद की पूरी दुनिया के साथ दर्द है पर खौफ नहीं। हाथ उठे हुए हैं। काबुलीवाले को पुकारते हुए।
उसका काम है टुकड़े-टुकड़े करना। छोटे से दायरे में। बहुत सीमित दायरे में। बहुत सीमित असर के साथ। यह दायरा बड़ा भी हो भी नहीं सकता। बीच-बीच में अपनी औकात दिखाता रहता है। टुकड़खोर की औकात। पर जिंदगी दहशत पर भारी पड़ती है। हमेशा। जैसे काबुल में। तबाही हुई। लेकिन जिंदगी तबाह नहीं हुई। ललक बच गई। जिंदा रहने की। उम्मीद की पूरी दुनिया के साथ दर्द है पर खौफ नहीं। हाथ उठे हुए हैं। काबुलीवाले को पुकारते हुए।
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