Sunday, August 17, 2008

एक हिंदुस्तानी कस्बा दुनिया में चमका

एक किस्सा। बिल्कुल ताजा। आज की ही बात। जम्बूद्वीपे भरतखंडे हरियाणा प्रांते। एक शहर भिवानी। एक स्कूल। एक प्रशिक्षक। और तीन घटनाएं। एक के बाद एक। ताबड़तोड़। पहले अखिल। फिर जितेंद्र और उसके बाद विजेंद्र। ऐसा कभी-कभार होता है। कि एक हिंदुस्तानी कस्बा दुनिया में चमके। यह कोई जादू नहीं है। न ही चमत्कार। लेकिन है वैसा ही कुछ। कि आंखें चुंधिया कर रह जाएं। भरोसा न हो। वहां बस दो चीजें थीं। मेहनत और लगन। हां, एक चीज और थी-हरियाणवी अंदाज। उसने मुक्का चलाया और चल गया। असली सिक्के की तरह।

Thursday, August 14, 2008

एक तस्वीर का इकसठवां साल


एक तस्वीर का इकसठवां साल। फिर भी ताजगी। नएपन का झोंका। वह पुरानी नहीं पड़ी। बासी नहीं हुई। धूल नहीं जमी उसपर। लगता है कि अब भी कुछ बचा है। सब खो नहीं गया। भ्रष्टाचार, खूनखराबे, जोड़-तोड़ और धमाकों में। सुकून होता है कि हम बचे हुए हैं। रंगों का मतलब है। हवा है। खुले मैदान हैं। हरियाली और खेत हैं। एक दूरदराज गांव में। नंगे बदन बच्चे। तिरंगा लेकर दौड़ना खेल नहीं है। ख्याल है। कद्र होनी चाहिए इसकी। यह नहीं रहा तो हम कहां रहेंगे। आजादी की शुभकामनाएं।

लोक पर तनी तंत्र की लाठी

लोक पर तनी तंत्र की लाठी। जनतंत्र का जीता जागता विद्रूप। सरकारों का जनता से यही सीधा संबंध। कहावतों, नीति वाक्यों के उलट-पलट गये अर्थ। लेकिन बदल जाना था जिन्हें, वे रह गयीं जस की तस। ज्यादा रूढ़-क्रूर। मसलन, जिसकी लाठी उसकी भैंस। सरकार की लाठी, सरकार की भैंस। हक मांगते लोगों पर दनादन-ताबड़तोड़। सत्ता का यही चलन। इसी में मारे गये ग्रेटर नोएडा में चार किसान। जनता सर्वोपरि, का खुला उपहास। एकता में अनेकता की उड़ती हर जगह खिल्ली। कर गुजर कर राजनीति भीगी बिल्ली।

Wednesday, August 13, 2008

लपटों में घिरा पंद्रह अगस्त

भादों में इतना धधकता। लपटों में घिरा पंद्रह अगस्त। उद्वेग, विक्षोभ और हिंसा से लहूलुहान कश्मीर। जम्मू भी वैसा ही लथपथ। जम्मू-कश्मीर एक प्रांत। डेढ़ माह से अलग-थलग। घाटी एक रूपक। वैमनस्यता, बिखराव और विभाजन का। जलते जम्मू के बाद घाटी में अपशकुनी छायाएं। खौफनाक मंसूबों से भरे चित्र। शांति-खुशहाली आ रही थी रफ्ता-रफ्ता। दगाबाज, दागी राजनीति से फिर वह छिन्न-भिन्न। तेरह साल बाद कर्फ्यू में दसों जिले। घर में लगी है आग। मिलकर उसे बुझाओ। नहीं तो फिर देश जलेगा। देश की खातिर, उसे नहीं भड़काओ।

कामयाबी चमकती सोने जैसी

कामयाबी दिखती है। चमकती है। सोने जैसी। उसे बोलने की जरूरत नहीं होती। गहरी नदी की तरह शांत। धीर-गंभीर। वह अभिनव है। हिंदुस्तान का सबसे कामयाब युवक। जिसने चुपचाप इतिहास लिख दिया। पूछने पर सिर्फ इतना कहा- आज का दिन मेरा है। कल किसी और का होगा। एकदम फलसफाना। वहां जो था, सब सच था। उस सच के बीच फलसफा। गले में सोने का तमगा। पीछे तिरंगा। फजां में राष्ट्रधुन। किसका सीना गर्व से फूल नहीं जाएगा। किसे नाज नहीं होगा। किसकी आंखें नम नहीं होंगी। पर वह शांत था। क्योंकि वह अभिनव है।

Monday, August 11, 2008

कुछ थमा, नेताओं का मन रमा

जनता के दुख-दर्दों, फजीहतों। जीवन-मरण के मुद्दों की तलाश। मंदिर मामलों के प्रभारी। आडवाणी, संघ परिवारी। अमरनाथ को कैसे छोड़ें, की लाचारी। चुनाव की आहट। जीतेंगे कैसे बिना टकराहट। अपनी-अपनी की खातिर। एक दल ने आग लगाई। दूसरे ने भड़कायी। अटकते-अटकते शुरू हुई बातचीत, फिर अटकी। अलगाव के आक्रामक तेवर। बंद और अब चक्काजाम। कश्मीर की हसीं वादियां। दिलकश समां। कौम का गम बहुत था। कुछ थमा, नेताओं का मन रमा।

Saturday, August 9, 2008

राजनीतिक ओलंपियाड-2008

हम पक्के खिलाड़ी हैं। असली खिलाड़ी। चौबीस कैरेट। कोई मिलावट नहीं। जो चाहे जांच ले। बड़े खेल के खिलाड़ी ठहरे। छोटा-मोटा खेल नहीं खेलते। कोई कच्चापन नहीं। न अनाड़ीपन। इसी में असली औकात पता चलती है। निकम्मा आदमी काम का साबित होता है। सबसे कमजोर सबसे मजबूत निकल जाता है। इसमें कोई मायाजाल नहीं है। गो कि अंधेरा है। प्रकाश नजर नहीं आता। साइकिल चलते-चलते घूम जाती है। यहां कोई इंतजार नहीं करता। कि चार साल बाद बीजिंग जाएंगे। धंस के देखो, भाई। यह हमारा ओलंपिक है। अमर खेल है।