अशोक की लाट में चार शेर हैं। चारों ओर देखते हुए। पीछे-पीछे चलने वाली भेड़चाल नहीं। वे चारों साथ होते हैं। हमेशा। पर दिखते तीन ही हैं। जो सामने है, वर्तमान है। जो नहीं है, भविष्य। आने वाले कल की तस्वीर। वह हमेशा दूसरी ओर से दिखता है। भविष्य की ओर से। यह भारत की नई त्रिमूर्ति है। मिथकीय नहीं। सचमुच की। खेलों की त्रिमूर्ति। नया राष्ट्रीय प्रतीक। राष्ट्रीय गौरव का चिह्न। तीन को देखिए। और चौथे को देखते रहिए। दिल्ली में, 2010 में। लंदन में, 2012 में। और उसके बाद।Saturday, August 23, 2008
आने वाले कल की तस्वीर
अशोक की लाट में चार शेर हैं। चारों ओर देखते हुए। पीछे-पीछे चलने वाली भेड़चाल नहीं। वे चारों साथ होते हैं। हमेशा। पर दिखते तीन ही हैं। जो सामने है, वर्तमान है। जो नहीं है, भविष्य। आने वाले कल की तस्वीर। वह हमेशा दूसरी ओर से दिखता है। भविष्य की ओर से। यह भारत की नई त्रिमूर्ति है। मिथकीय नहीं। सचमुच की। खेलों की त्रिमूर्ति। नया राष्ट्रीय प्रतीक। राष्ट्रीय गौरव का चिह्न। तीन को देखिए। और चौथे को देखते रहिए। दिल्ली में, 2010 में। लंदन में, 2012 में। और उसके बाद।Thursday, August 21, 2008
यही ओलंपिक है
विचार के साथ एक मुश्किल है। वह महान हो सकता है। या फिर महानतम। पर उसका नाम नहीं होता। कोई उसे छू नहीं सकता। ओलंपिक यह मसला हल कर देता है। विचारों को नाम देकर। निराकार को साकार बनाकर। सबके सामने। यही ओलंपिक है। विचार के नामकरण का संस्कार। कोई उसे अपना नाम देता है। हाड़ मांस का इंसान। जसे सबसे तेज बोल्ट। सबसे ऊंची येलेना। सबसे ताकतवर फेल्प्स। बीजिंग इसीलिए याद किया जाएगा। कि अब लोग विचार को छू सकेंगे। उससे बात करेंगे। उसके जैसा बनने की कोशिश करेंगे। यही अगले विचार को जन्म देगा। दुनिया भर में।
छप्पन साल बाद धोबीपाट
हर चेहरा किताब है। बहुत कुछ लिखा होता है उसपर। सबके लिए। इत्मीनान। हौसला। खुशी। संतोष। यही सब इस चेहरे पर है। साफ-साफ इबारत। कि कोई भी पढ़ ले। जो स्कूल न गया हो वह भी। यह सुशील सूरत है। नजफगढ़ के नए नवाब की। भारी उपलब्धि। हल्की सी हंसी। सुशील के पास कांसे का तमगा है। छप्पन साल बाद धोबीपाट। एक चेहरा यहां नहीं है। पर दिखता है। विजेंर का। उसके घूंसे का। ताकत और कौशल का। पदक उसे भी मिला। पर वह कुछ और चाहता है। कि रंग बदल जाए पदक का। सुनहरा हो जाए। हम भी यही चाहते हैं।
दुनिया के नक्शे में पड़ोसी चुने नहीं जा सकते
दुनिया के नक्शे में पड़ोसी चुने नहीं जा सकते। वे चुने-चुनाए मिलते हैं। वह दोस्त हो या दुश्मन, अच्छा हो या बुरा, लोकतंत्र हो या सैन्य तानाशाही, उसके साथ रहना सभी देशों की मजबूरी है। भारत की भी। कूटनीतिक रूप से विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी का यह बयान ठीक हो सकता है कि मुशर्रफ का जाना पाकिस्तान का आंतरिक मामला है लेकिन इससे पड़ोस में स्थितियां बदल नहीं जातीं। इसलिए भारत के लिए यही बेहतर होगा कि वह इस आंतरिक मामले पर नजदीकी नजर रखे और वहां की गतिविधियों के अनुरूप और बदलावों से निपटने के लिए पूरी कूटनीतिक और रणनीतिक तैयारी रखे। इसका इशारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने यह कहकर किया था कि मुशर्रफ के जाने से भारत के पड़ोस में एक बड़ा शून्य पैदा हो जाएगा।नारायणन का संकेत स्पष्ट था। उनकी चिंता केवल शून्य को लेकर नहीं थी बल्कि यह थी कि वह शून्य कौन भरेगा।पाकिस्तान के वर्तमान हालात में इस शून्य को भरने की तीन सूरतें हो सकती हैं। पहली यह कि मुशर्रफ को इस्तीफे के लिए मजबूर करने वाली लोकतांत्रिक ताकतें मजबूत होकर उभरें और पाकिस्तान को लोकतंत्र की ओर ले जाकर स्थायित्व दें। दूसरी सूरत कट्टरपंथी जमातों और मुल्लाओं की ताकत बढ़ने की है, जिन्हें अहसास है कि मुशर्रफ जैसे साझा दुश्मन के अभाव में किसी तरह एक हुई नवाज शरीफ और आसिफ अली जरदारी की सियासी जमातें बिखर सकती हैं। यह उनके लिए खासतौर पर जरखेज जमीन होगी। तीसरी स्थिति सेना के एक बार फिर सत्ता पर नियंत्रण की है, जो हर हाल में पाकिस्तान की रक्षा और विदेश नीति चलाती है।
पाकिस्तानी शासन में सेना का रसूख कितना है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सेनाध्यक्ष ने मुशर्रफ पर लगाए गए आरोपों को सेना के खिलाफ माना और कहा कि वह किसी भी सूरत में मुशर्रफ पर महाभियोग के नाम पर सेना की छवि धूमिल नहीं होंने देंगे। शासन को सेनाध्यक्ष की बात सुननी और माननी पड़ी। यह माना जा सकता है कि महाभियोग की प्रक्रिया लंबी चलती। ऐसे में सेना और नागरिक प्रशासन के बीच पहले से चले आ रहे मतभेद और गहरे होते। सत्ता का केंद्र न बदलता तो कम से कम उसकी धुरी जरूर कुछ खिसक जाती। एक तथ्य यह भी है कि पाकिस्तान में किसी पूर्व सेनाध्यक्ष पर महाभियोग कभी नहीं लगाया गया। हालांकि आजादी के साठ में से चालीस साल वही सत्ता पर काबिज थे।तीनों ही स्थितियों में पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा और उसमें कोई अंतर नहीं आएगा। लेकिन भारत के लिए यह जरूरी होगा कि वह लोकतंत्र के पहरुओं के साथ-साथ पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल अश्फाक परवेज कियानी की गतिविधियों पर नजर रखे और उन्हें समझने की कोशिश करे। पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व मुखिया रह चुके कियानी दरअसल मुशर्रफ का विस्तार हैं और शासन में सेना की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी। पाकिस्तान में भारत के पूर्व राजनयिक जी पार्थसारथी मानते हैं कि तालिबान को समर्थन के मामले में सेना की भूमिका नहीं बदलेगी लेकिन कश्मीर को लेकर उसके रुख में मामूली बदलाव आ सकता है।
भारत के लिए यह भी जरूरी होगा कि वह अमेरिकी प्रशासन और खुफिया तंत्र की गतिविधियों पर नजर बनाए रखे। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के परदे में नौ साल तक मुशर्रफ को हर संभव मदद देने वाले अमेरिका के लिए भी पाकिस्तान में हुआ यह आंतरिक परिवर्तन अर्थपूर्ण है। दुनिया में लोकतंत्र के अलमबरदार बने अमेरिका की मुश्किल यह है कि सैन्य तानाशाहों से संपर्क रखना उसे ज्यादा सहूलियत भरा लगता है लेकिन वह लोकशाही की खुलेआम मुखालफत भी नहीं कर सकता। वह सार्वजनिक रूप से शायद अपनी यह इच्छा भी जाहिर नहीं कर सकता कि उसका इरादा इस इलाके पर अपनी धौंस जमाए रखने के लिए कश्मीर जसी किसी जगह पर पांव जमाने का है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा करना कठिन होगा।सेना और लोकतांत्रिक ताकतों को अलग रख दें तो पाकिस्तान की तीसरी स्थिति कट्टरपंथी जमातों के बढ़ते प्रभाव की होगी। अमेरिका के दम पर इन ताकतों को सीमित दायरे में चुनौती देने वाले मुशर्रफ पर कई बार हमले हुए, जिनमें वे बाल-बाल बच गए। उस समय सेना पूरी ताकत से उनके साथ थी। एक तरह से देखा जाए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था को सैन्य प्रशासन से ज्यादा खतरा धार्मिक कट्टरपंथी ताकतों से है। मतलब यह कि उन्हें लगातार दुधारी तलवार पर चलना होगा। मुशर्रफ के जाने से सबसे ज्यादा खुशी और राहत इसी तबके ने महसूस की है। इन ताकतों के उभरने का सीधा असर भारत पर होगा। इनका लगभग पूरा अस्तित्व अफगानिस्तान में तालिबान और भारत में कश्मीर पर टिका हुआ है। तेरह साल की अपेक्षाकृत शांति के बाद घाटी में एक बार फिर से उठ रही आजादी की मांग से उनके हौसले जरूर कुछ बुलंद हुए होंगे। इस पर नजर रखना भारत की प्राथमिकता होना चाहिए। उसे पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त सतीश चंद्रा की इस बात पर कम भरोसा करना चाहिए कि पाक में बदलाव और यथास्थिति पर्यायवाची शब्द हैं। भारत के साथ उसके रिश्तों में कोई नाटकीय बदलाव आने की संभावना नहीं है।
Wednesday, August 20, 2008
उन्हें भी तो दो कोई पानी चुल्लू भर
आपन-आपन मेड़ संभालो/बढ़ो आत है पानी। सावन-भादों में हरहराता घुसा ही चला आता है। सालों से। हर बरस बारिश का इंतजार। फिर बाढ़ और उसका कहर। गांव, कस्बे, शहर, महानगर। मुहल्ले, कॉलोनियां, सड़कें और खेत। सब कहीं जसे जल-कारावास। कितने मरे पिछले साल और कितने अबकी बार। कितना चौपट होगा जन-धन। हाथ पर धरे हाथ-गिनते-गुनते रहिये। तरक्की पर है देश। अगले साल देखना, होगी ज्यादा बर्बादी। जिनके निकम्मेपन से मरते हैं बेवजह लोग। उन्हें भी तो दो कोई पानी चुल्लू भर।
Tuesday, August 19, 2008
इज्जत से या बेआबरू होकर
न्यूटन ने कहा जो ऊपर जाता है, नीचे जरूर आता है। सो तुम भी आ गए मियां मुशर्रफ। ये तो होना ही था। यह प्रकृति है। विज्ञान है। जो आया है, विदा भी होगा। इज्जत से हो या बेआबरू होकर। विदाई आखिरकार विदाई होती है। उसमें दु:ख होता है। पर केवल दु:ख नहीं होता। घर से बेटी विदा हो तो परिवार के आंखों में खुशी। तानाशाह जाए तो मुल्क की धड़कन में। लोकतंत्र की सांसों में। इसमें तानाशाह की आंखें नम होती हैं। खुशी बाहर होती है। सड़क पर। गली-मोहल्ले में। शहर में। देश में।
Monday, August 18, 2008
वाह, फेल्प्स वाह!
वाह, फेल्प्स वाह! स्वर्णिम शिखर पर। कितनी बातें झूठ साबित कीं और कितनी सच। बचपन की बीमारी। उस पर फतह। शिक्षिका ने कहा था-एकाग्रता नसीब में नहीं। उसी के बूते सर्वोत्कृष्ट। मां ने कहा-उसके दिमाग में घड़ी। जो समय भरा, उसे साधा। प्रतिस्पर्धियों ने कहा-वह तो भविष्य से आया। छत्तीस बरस पहले स्पिट्ज के सात थे, अब फेल्प्स आठ। आठों प्रतिस्पर्धाओं में विजेता। सात में नये रिकार्ड। बुधवार का दिन, एक घंटा और दो स्वर्ण। वाकई महानतम। इस घड़ी के साक्षी होना सौभाग्य।
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