Monday, July 7, 2008

अजनबी और दोस्त दो शब्द नहीं रह जाते

राजनीति अनिश्चितता का नाम है। कब क्या होगा-कुछ पता नहीं। अजनबी और दोस्त दो शब्द नहीं रह जाते। एक हो जाते हैं। अजनबी दोस्त बनते हैं, दोस्त अजनबी। यह मौकापरस्ती भी है। एक साथ चलने की मजबूरी। इसके पीछे भी कुछ है। किसी को घेरने की। किसी से हिसाब बराबर करने की। अपने को सुरक्षित रखने की। भीतर ही भीतर गोटियां चली जाती हैं। एक-दूसरे पर भारी पड़ने की। करार पर मिलन बेकरारी। लेकिन यह बेजारी में न बदले। लोग बेजार हुए तो ज्यादा गड़बड़ हो सकती है।

Sunday, July 6, 2008

कि मुसीबत में उम्मीद की चादर तनी रहे..

वह चिराग-ए-चिश्त हैं। चिश्तिया विरासत की शान। शहे औलिया हैं। औलिया लोगों के बादशाह। ग़रीब नवाज़ हैं। कायम है ख्वाजा जी, महाराज की बादशाहत। जमीनी बादशाह आए-गए। बादशाहतें खत्म हुई। मोइनुद्दीन वहीं हैं। उतने ही उदार। नीयत और मंशा से बेपरवाह। उनसे उम्मीद की खेती नहीं सूखती। कोई नहीं लौटता खाली हाथ। कुछ न कुछ सबकी झोली में। लोकतंत्र में वोट और सीटों की दरकार। मन्नत मांगते हैं। चादर चढ़ाते हैं। कि मुसीबत में उम्मीद की चादर तनी रहेगी। बचा ले जाएगी। महंगाई, मुद्रास्फीति और बे-करारी से।

Saturday, July 5, 2008

नयी नजर, उड़ती तितलियां और प्यार का गुनाह

इस्लामी दुनिया की ये किताबें एक नया नजरिया पेश करती हैं। खासतौर पर महिलाओं की स्थिति के बारे में। संभव है कि अब ऐसी किताबें सामने आएं और महिला आत्मकथात्मक लेखन को नए सिरे से परिभाषित करें। यह संभावना हमेशा बनी रहनी चाहिए कि जिंदगियां तराशने, सपने, विचार और ख्वाहिशों को कल्पना में जोड़ने की आजादी सबको होगी। कल्पना पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा। प्रस्तुत है 'नई नजर और उड़ती तितलियां' का अंतिम भाग.


एक और किताब नोरमा खोरी की है। 'फारबिडेन लव।' वर्ष 2006 में इस किताब के छपने के बाद हंगामा हो गया। जार्डन की रहने वाली नोरमा ने किताब में अपने साथ-साथ अपनी एक दोस्त डालिया की कहानी कही है। महज 19 साल की उम्र में दोनों लड़कियों ने अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने तय किया कि वे परिवार की छाया से निकलकर अपने तईं कुछ करेंगी, उन्होंने ऐसा किया भी। अम्मान में दोनों लड़कियों ने मिलकर ब्यूटी पार्लर खोला जो शहर में अपने ढंग की एक नई चीज थी। उन्हें इस पार्लर के साथ आजादी का एहसास भी मिला, जो काम के बदले मिलने वाले पैसे के मुकाबले कहीं बड़ा था। पार्लर के पीछे एक कमरा था जहां, जब ग्राहक न हों, दोनों बैठकर दुनिया-जहान की बातें करती थीं। इसमें हकीकत से ज्यादा सपने थे। बीच-बीच में पर्स में छिपाकर लाई गई सिगरेट के कश।
एक दिन नोरमा पार्लर में नहीं थी। डालिया अकेली थी। एक पुरुष ग्राहक उनके पार्लर में आया। रायल सेना का एक ईसाई सैनिक। उसका नाम माइकल था। माइकल ने डालिया और फिर डालिया से सुने किस्से के आधार पर नोरमा के सपनों में रंग भर दिए। डालिया को एक लड़के से प्रेम था, लेकिन अम्मान की सामाजिक व्यवस्था में यह गुनाह माना जाता था। दो वर्ष तक यह राज सिर्फ डालिया और नोरमा के बीच रहा। लेकिन बाद में डालिया के भाई और उसके पिता को इसकी खबर मिल गई। डालिया की मां उनकी राजदार थीं पर घर की सामाजिक व्यवस्था में उनकी आवाज के कोई माने नहीं थे।
एक सुबह नोरमा को खबर मिली की डालिया अब दुनिया में नहीं है। उसकी हत्या कर दी गई है। हत्यारे उसी घर में रहते थे-उसके पिता और उसके भाई। लाश लाकर घर के बाहर रखी गई तो मां को ये भी हक नहीं था कि वो रो सके। सब्जी और गोश्त काटने वाले चाकू से डालिया को गोद डाला गया था। उसकी छब्बीसवीं सालगिरह के ठीक दो महीने बाद। नोरमा के लिए अब अम्मान का कोई मतलब नहीं रह गया था। उसकी सहेली दुनिया में नहीं थी। उसका सपना आधा रह गया था। उसके लिए अम्मान में स्थितियां अच्छी नहीं थी। ऐसे में माइकल ने उसकी मदद की।
नोरमा की किताब पर जार्डन में खासा विवाद हुआ। कहा गया कि यह सच्ची कहानी नहीं है। सवाल यह है कि इज्जत के नाम पर हत्या जार्डन की हकीकत है या नहीं। नोरमा का झूठ संभवतः उसी वजह से हो, जिससे अजर नफीसी ने अपनी किताब में अपने पात्रों के नाम बदल दिए।
इस्लामी दुनिया की ये किताबें एक नया नजरिया उपलब्ध कराती हैं। खासतौर पर महिलाओं की स्थिति के बारे में। बांग्लादेश की तस्लीमा नसरीन को भी इसी श्रृंखला से जोड़ा जा सकता है। लज्जा को विशेष रूप से। संभव है कि अब ऐसी किताबें सामने आएं और महिला आत्मकथात्मक लेखन को नए सिरे से परिभाषित करें। अजर नफीसी ने एक तरह से इस ओर इशारा किया। कहा कि मुझे अक्सर सपना आता है कि मौलिक अधिकार कानून में एक और अधिकार जुड़ गया है- कल्पना का अधिकार। यह संभावना हमेशा बनी रहनी चाहिए कि जिंदगियां तराशने और सपने, विचार और ख्वाहिशों को कल्पना में जोड़ने की आजादी सबको होगी। कल्पना पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा।

नयी नजर और उड़ती तितलियां- दो

स्लामिक देशों में महिलाओं की स्थिति पर महिलाओं ने ही अपने दर्द बयान किए हैं। कई किताबें भी लिखी गई हैं। उन्हीं किताबों की पड़ताल करता लेख, नई नजर और उड़ती तितलियां का दूसरा भाग
मुख्तारन माई पाकिस्तान की हैं। उनकी किताब 'इन द नेम आफ आनर' मुशर्रफ की किताब 'इन द लाइन आफ फायर' से मात्र दो महीना पहले ही आई। मुख्तारन माई न तो बहुत पढ़ी लिखी हैं और न ही लेखिका हैं। मगर, संवेदना और सामाजिक ताने-बाने की जटिलता उस किताब के हर पन्ने से झलकती है। 1972 में पैदा हुईं मुख्तारन बी जटोई इलाके में मीरवाला गांव की रहने वाली हैं। एक स्थानीय बलूच पंचायत ने उन्हें इज्जत के नाम पर सजा सुनाई- उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाए। मस्तोई बलूच कबीले के कुछ लोगों ने ऐसा ही किया। आमतौर पर औरतें इस तरह की घटना के बाद आत्महत्या कर लेती हैं लेकिन मुख्तारन उसके खिलाफ बोलीं, लड़ीं, जीतीं और कामयाब रहीं, एक हद तक। अदालत ने बलात्कारियों को सजा सुनाई और कहा कि मुख्तारन को कबीला जुर्माना की पूरी रकम दे। मुख्तारन को विदेश से भी काफी सहायता मिली। दरअसल, मुख्तारन का बड़ा रूप सिर्फ मुकदमा जीतने और गुनहगारों को सजा दिलाने में नहीं दिखता। वह उसके बाद नजर आता है। मुख्तारन ने मीरवाला में पूरी रकम लगाकर लड़कियों के लिए स्कूल खोला क्योंकि उनका मानना था कि पढ़ी-लिखी होने पर उनके साथ इस तरह का अन्याय नहीं होगा। वे अपनी बात कह सकेंगी और उनकी बात सुनी जाएगी। मुख्तारन माई के लिए खतरा अब भी कम नहीं हुआ है। बलात्कारी मस्तोई कुछ समय में जेल से छूटकर गांव लौट आएंगे। धमकियां अब भी मिलती हैं लेकिन मुख्तारन माई का नाम इतना बड़ा हो गया है कोई आसानी से उन्हें छूने की हिम्मत नहीं करेगा। यह बात मुशर्रफ के उस बयान के बाद और साफ हो गई जिसमें उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था, कि यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, कुछ औरतें विदेश जाने और पैसे ऐंठने के लिए ऐसी कहानियां सुनातीं हैं। मुशर्रफ उस समय अपनी किताब के प्रचार के सिलसिले में अमेरिका में थे। उनके इस बयान पर दुनियाभर में प्रतिक्रिया हुई और अंततः राष्ट्रपति सचिवालय को कहना पड़ा कि उनके बयान को गलत ढंग से छापा गया है। 29 साल की मुख्तारन माई को अमेरिकी सीनेट को संबोधित करने के लिए बुलाया गया। उसी समय उन्होंने पहली बार गांव के बाहर कदम रखा। टाइम पत्रिका में निकोलस क्रिस्टाफ ने लिखा, मैं नहीं जानता कि गांधी या मार्टिन लूथर किंग को देखने वाले पत्रकारों को क्या अहसास हुआ होगा लेकिन मुख्तारन माई के वजूद में मुझे महानता, सरापा, सिर से पैर तक दिखती है।

Friday, July 4, 2008

नयी नजर और उड़ती तितलियां

स्लामी देशों में औरतों के दुख-दर्द को बताती कई किताबें आयीं। इनफिडेल, थाउजेंड स्प्लेंडिड सन्स और द बुकसेलर आफ काबुल, में इन देंशों की स्त्रियों के दुखों की कई मिसालों से पिछले लेख में आप रू-ब-रू हुए। इस बार इन द नेम आफ आनर, रीडिंग लोलिता इन तेहरान और फोरबिडेन लव। इस्लामी दुनिया पर ये किताबें हमारे सामने एक नया नजरिया रखती हैं। प्रस्तुत है इस्लामी दुनिया में महिलाओं की स्थिति की पड़ताल करती कुछ किताबों पर विशेष लेख।

पहला भागः

' ईरानी इस्लामी गणराज्य के शुक्रगुजार हैं कि उसने हमें तमाम चीजें नई रोशनी में देखने की सलाहियत दी, जिसे हम आमफहम मान बैठे थे। हम इस्लामी गणराज्य के कर्जदार हैं कि उसने हमें पार्टियां करने, सार्वजनिक रूप से आइसक्रीम खाने, प्रेम करने, एक दूसरे का हाथ थामे चलने, लिपिस्टिक लगाने, ठहाका लगाकर हंसने और तेहरान में लोलिता पढ़ने का शऊर दिया।'
अजर नफीसी ने, जाहिर है यह टिप्पणी व्यंग्य में की है। वह खुद नव्बे के दशक के आखिरी वर्षों में इस माहौल से गुजरीं और अंततः मजबूरी में उन्हें अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी। तेहरान विश्वविद्यालय में अजर नफीसी को कुछ किताबें पढ़ाने पर तेहरान की धार्मिक पुलिस की ज्यादती सहनी पड़ी। उसके प्रोफेसर खफा हो गए और अंत में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अजर का इस्तीफा मंजूर नहीं हुआ और दो साल बाद उन्हें तेहरान विश्वविद्यालय में बुर्का न पहनने की वजह से निकाल दिया गया।
अजर नफीसी की किताब 'रीडिंग लोलिता इन तेहरान' उनकी निजी जिंदगी की दास्तान बयान करने के साथ उन सात लड़कियों की कहानी कहती है, जिन्होंने छिप-छिपाकर '1984 द ग्रेट गैट्स्बी', 'मैडम बोवेरी' और 'प्राइड एंड प्रीज्यूडिस' पढ़ी। लेकिन, सबसे ज्यादा असर 'लोलिता' का रहा। अजर कहती हैं कि इन लड़कियों के साथ 'लोलिता' पढ़ते हुए उन्हें अक्सर एक तितली का ख्याल आता है, जिसे पिन के सहारे दीवार में चुन दिया गया है। विश्वविद्यालय में सीमित किताबें पढ़ाने का बंधन तोड़ने के लिए अजर ने इन लड़कियों को अपने घर बुलाया, हर बृहस्पतिवार। कई साल तक।
इन लड़कियों में नसरीन, मन्ना, महशिद, मित्रा, सनाज, यासी और अजीन शामिल थीं। एक लड़का भी था-नीमा। किताब में ये मूल चरित्रों के बदले हुए नाम हैं। हालांकि नसरीन अब इंग्लैंड में है, यासी टेक्सस में, अजीन कैलीफोर्निया और मित्रा कनाडा में। मन्ना, महशिद और नीमा ईरान में ही हैं। सनाज का अजर ने किताब के अंत में उल्लेख नहीं किया है। अजर ने पहली बार इन लड़कियों के घर पहुंचने पर उनकी फोटो खींची थी। काले बुर्के में सर से पांव तक ढकी हुई, सिर्फ आंखें नजर आती।
दो साल बाद अजर ने इन लड़िकयों की एक और तस्वीर खींची। तब तक वे साथ-साथ कई किताबें पढ़ चुकी थीं। इस तस्वीर में लड़कियां जींस, रंग बिरंगे कुर्ते और टी-शर्ट में है। घर में दाखिल होते ही बुर्का उतार देती थीं। ये दो तस्वीरें अजर की सबसे कीमती धरोहर हैं, जिन्होंने साबित किया है कि किसी को किताब भी कितना बदल सकती है, अंदर तक।

Wednesday, July 2, 2008

'द प्राफेट' : अलमुस्तफा उसका नाम था

खलील जिब्रान का व्यक्तित्व करिश्माई था। वे अरबी, अंगरेजी फारसी के ज्ञाता, दार्शनिक और चित्रकार भी थे। उन्हें अपने चिंतन के कारण जाति से बहिष्कृत कर देश निकाला तक दे दिया गया था। उनका जन्म लेबनान के 'बथरी' नगर में हुआ था। उनमें अद्भुत कल्पना शक्ति थी। खलील जिब्रान की पुस्तक 'द प्राफेट' का दुनिया की 132 भाषाओं में अनुवाद हुआ है। मैंने भी इस पुस्तक की हिंदी में पुनर्रचना की है। और उसे अपनी आवाज दी। उस आडियो कैसेट को तो आपमें से बहुतो ने सुना होगा। पर जिन्होंने उसे नहीं सुना उनके लिए वह अमर रचनाएं पेश कर रहा हूं। यह आडियो कैसेट 13 भागों में है। इसका हर भाग आपको समय-समय पर पढ़ने को मिलेगा। हम आपको अल मुस्तफा की कुछ दुर्लभ पेंटिंग्स भी समय-समय पर उपलब्ध कराएंगे।

पहला भाग :

लमुस्तफा उसका नाम था। बारह बरस तक उसने आरफलीज नगर में उस जहाज का इंतजार किया था, जो उसे अपनी जन्मभूमि की तरफ ले जाने वाला था। शहर के बाहर की टीकरी पर वो रोज समुंदर की ओर देखता था। और उस दिन इलूल महीने की सातवीं तारीख को जब फसल काटने के दिन थे। उसे अपना जहाज कोहरे के साथ आता नजर आया। उसके दिल के दरवाजे खुल गए और उसकी खुशी पंख फड़फड़ाकर समुंदर में दूर तक फैल गई। फिर उसने आंखें बंद की और अनंत शांति में डूबकर इबादत की। जब अलमुस्तफा टीकरी से नीचे उतर रहा था, तो उस पर उदासी के बादल छा गए। वो सोचने लगा कि मैं यहां से कैसे जा सकूंगा। बिना दुख महसूस किए, बिना अपने ज़ज्बात पर घाव सहे। जहाज बंदरगाह के बेहद करीब पहुंच गया था। उसने देखा। और जैसे ही वो मुड़ा सामने दूर-दूर तक लोग नजर आ रहे थे। उसी की ओर बढ़ते हुए। वे उसी का नाम भी ले रहे थे। सबका कहना था कि उसे शहर छोड़ कर नहीं जाना चाहिए। लोगों ने मनुहार की। उसे अपना लाड़ला बेटा कहा। चिरौरी, विनती की। पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। सिर झुका लिया। जो पास खड़े थे उन्होंने उसकी छाती पर टपकते आंसू देखे। तभी शहर की इबादतगाह से एक औरत बाहर आई। उसका नाम था अलमित्रा। उसने कहा, तुम प्रभु के पैगंबर हो। अब तुम्हारा जहाज आ पहुंचा है और तुम्हारा जाना जरूरी है। तो जाओ। हमारा प्रेम तुम्हारा बंधन नहीं बनेगा। फिर भी हम तुमसे प्रार्थना करते हैं, कि जाने से पहले तुम सच के अपने भंडार में से हमें कुछ दे जाओ। जो हम अपनी संतानों को देंगे। और वे अपनी संतानों को। और वो अमर रहेगा। जीवन और मौत के बीच में जो भी है। और उसके बारे में जो भी तुम जानते हो। हमें बताओ। फिर लोगों ने प्रेम, विवाह, बच्चे, दुख, खुशी, घर, कपड़े, कानून, समय, सुंदरता भलाई-बुराई, इबादत, धर्म और मौत और न जाने किन-किन विषयों पर उससे सवालात किए। अलमुस्तफा ने एक-एक करके सबको जवाब दिया।

आने वाली नस्लें नदी को सड़क न समझें


जो जहां है, रहना चाहिए। जैसा है, करीब-करीब वैसा ही। नदी को नदी। पहाड़ को पहाड़। सड़क को सड़क। ताकि हम बचे रहें। आने वाली नस्लें नदी को सड़क न समझें। जंगल कट-कटाकर शहर न बन जाएं। यहां एक शहर था। सड़क थी। एक दिन बारिश हुई। झमाझम। सब उलट-पुलट गया। बरसात ने दिल तोड़ दिया। नदी सूखकर सड़क हो गई। फिर तो सड़क को नदी बनना ही था। ऐन मुंबई में। मायानगरी। यह माया नहीं है। असली पानी है। असली मुसीबत। खेल-खेल में पानी-पानी।