Saturday, October 31, 2009

साथ बढ़े की भावना : मधुकर उपाध्याय


गोरखपुर। वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने कहा कि उत्सव प्रेमी देश है अपना भारत। उत्स उत्थान से बना है। अपनी संस्कृति की यह सहज वृत्ति है कि यहां मेले, त्यौहार आदि सब मिल कर मनाते हैं। आयोजनों की भावना यही होती है कि सब साथ चलें, साथ बढ़े, एक भाषा बालें, एक मन हो। ऐसे आयोजनों का संदेश यही होता है और यदि सभी लोग इससे सीख पाएं तो ही आयोजनों की सार्थकता है।

साभार - दैनिक जागरण, गोरखपुर

Sunday, October 4, 2009

तो गांधी भी जरूरत भर



वर्धा के सेवाग्राम आश्रम में बापू कुटी के सामने खड़े होने पर यह अंदाजा नहीं होता कि महात्मा गांधी इसी झोपड़ी में रहते थे और इसे बनाने में सौ रुपए से कम खर्च आया था। दरअसल नमक आंदोलन के समय साबरमती आश्रम छोड़ते हुए गांधी ने कहा था कि वह अंग्रेजों से आजादी मिले बिना अपने आश्रम लौट कर नहीं आएंगे। यह बात 1930 की है जबकि आजादी उसके सत्रह साल बाद मिली। इस अवधि में महात्मा गांधी किसी दूरदराज के गांव में रहना चाहते थे और इस सिलसिले में उन्होंने मीराबेन को पहले ही शेगांव भेज दिया था। शेगांव तक सड़क भी नहीं थी। पांच किलोमीटर पैदल चलकर ही वहां पहुंचा जा सकता था। गांधी नमक कानून तोड़ने के छह साल बाद तीस अप्रैल 1936 को सेवाग्राम पहुंचे।


मीराबेन और अपने अन्य अनुयायियों से गांधी ने सेवाग्राम में रहने की अपनी शर्ते स्पष्ट कर दी थीं। उन्होंने साफ कर दिया था कि अगर उनकी झोपड़ी ‘आदि निवास बनाने में सौ रुपए से ज्यादा खर्च आया तो वह वहां नहीं रहेंगे। यह गांधी की मितव्ययिता थी, जिसकी शुरुआत उन्होंने नमक आंदोलन के समय खाने-पीने की सामग्री और एक ग्राम से ज्यादा घी किसी को नहीं दिए जाने की शर्त लगाकर की थी। इस दौरान एक बार वह महादेव देसाई से केवल इस बात को लेकर नाराज हो गए कि देसाई ने उनके लिए मामूली टूटा पानी का कप रहते हुए दूसरा कप खरीद लिया था। काफी देर तक गांव की अर्थव्यवस्था और एक कप की कीमत का महत्व समझाते हुए गांधी ने देसाई को विवश कर दिया कि वे लौटकर कप दुकानदार को वापस कर दें। सेवाग्राम में गांधी की झोपड़ी बनाने में आने वाला खर्च कम रखने के लिए झोपड़ी की छत बांस और खपरैल से बनाई गई। दीवारें मिट्टी की थीं। खिड़की-दरवाजे बांस जोड़कर तैयार किए गए। एक टांड़ भी बांस की और एक आलमारी भी। नीचे बिछाने के लिए खजूर के पत्तों की चटाई। यह सुझाव गांधी का ही था कि जहां तक संभव हो स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री का ही इस्तेमाल किया जाए। निश्चित रूप से कांग्रेस पार्टी की ओर से इस समय चलाया जा रहा किफायतशारी के अभियान और उसके आज के नेताओं को पलट कर गांधी और अपने इतिहास से ही बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। यह और बात है कि तीसरे दर्जे में यात्रा करने की वजह से गांधी के अभियानों पर शायद पहले दर्जे की यात्रा से ज्यादा खर्च आता था। लेकिन इससे आम लोगों के बीच रहने और उन तक पहुंचने की गांधी की मंशा का महत्व कम नहीं होता। सरोजनी नायडू ने एक बार इसी पर टिप्पणी की थी कि गांधी को गरीब लोगों की तरह तीसरे दर्जे में यात्रा पर खर्च बहुत ज्यादा आता है।

राजनीतिक पहलू को छोड़ दें तब भी रोजमर्रा के जीवन में गांधी कमखर्ची की मिसाल कायम किया करते थे। इसमें लिफाफे के पीछे की जगह पर लिखना, चीजों का उतना ही इस्तेमाल जितना जरूरी हो। उनका कहना था कि धरती पर सबकी जरूरत भर का सामान है लेकिन सबके लालच भर का नहीं। वह शब्दों के मामले में भी उतने ही सतर्क रहते थे और सिर्फ जरूरत भर शब्द इस्तेमाल करते थे। नमक आंदोलन के समय दांडी के समुद्र तट पर पांच अप्रैल 1930 को संदेश देने के लिए कहे जाने पर गांधी ने कागज के एक छोटे से टुकड़े पर लिखा ‘आई वांट वर्ल्ड सिंपथी इन दिस बैटल ऑफ राइट अगेंस्ट माइटज् (मैं अन्याय के खिलाफ इस संघर्ष में दुनिया की सद्भावना चाहता हूं)। गांधी ने यह संदेश एक मामूली कलम से लिखा। हालांकि कुछ ही समय पहले वह आंध्र प्रदेश के एक उद्योगपति केवी रत्नम को यह सलाह दे चुके थे कि रत्नम फाउंटेन पेन के निब अपने कारखाने में बनाएं, जिनका तब तक आयात होता था। रत्नम ने निब पर विदेशी एकाधिकार खत्म करते हुए देश में पहली बार फाउंटेन पेन का उत्पादन शुरू किया। इस पेन का नाम रत्नम रखा गया। केवी रत्नम ने फाउंटेन पेन बाजार में उतारने से पहले दो कलम गांधी को उनके वर्धा आश्रम के पते पर भेजे। गांधी ने संभवत: उसी कलम से केवी को जवाब लिखा और कहा धन्यवाद।


पिछले सप्ताह गांधी की सादगी और किफायतशारी का मजाक उड़ाते हुए मशहूर पेन निर्माता कंपनी मो ब्लां ने दांडी मार्च की याद में एक फाउंटेन पेन का निर्माण किया, जिसकी कीमत 14 लाख रुपए रखी। इस तरह के केवल 241 फाउंटेन पेन बनाए जाएंगे क्योंकि साबरमती आश्रम से दांडी की दूरी 241 मील थी। हाथ से बनाए गए हर फाउंटेन पेन में रोडियम प्लेट वाली अठारह कैरेट सोने की निब होगी जिस पर लाठी लिए हुए चलते गांधी का चित्र बना होगा। निश्चित तौर पर गांधी की सादगी और नमक आंदोलन की याद से मो ब्लां का कोई संबंध नहीं है और उनका उद्देश्य शुद्ध व्यावसायिक है क्योंकि उनकी नजर में गांधी बहुत बड़े और विश्वव्यापी ब्रांड हैं। इसके साथ ही कंपनी तीन हजार पेन की एक और श्रृंखला बनाएगी जिसका नाम महात्मा होगा। इनकी कीमत पौने दो लाख से डेढ़ लाख रुपए के बीच होगी। मो ब्लां को व्यापार करने से कोई नहीं रोकना चाहता लेकिन उससे यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए था कि इन फाउंटेन पेन की बिक्री से हुई कमाई कैसे खर्च की जाएगी। यह भी कि क्या इसका कुछ हिस्सा शिक्षा और स्कूलों पर खर्च होगा। क्या कंपनी 241 मील की यात्रा की याद में 241 गांव गोद लेकर उनमें सड़क, पानी और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराएगी। अगर नहीं, तो उसे गांधी और महात्मा नाम के इस्तेमाल का कोई अधिकार नहीं।

Friday, October 2, 2009

ईश्वरत्व से बचते हुए


महात्मा गांधी जीवन भर इस डर से जूझते रहे कि कहीं उनके प्रशंसक और अनुयायी उन्हें ईश्वर बनाकर मंदिर में स्थापित न कर दें। उनकी पूजा अर्चना प्रारंभ हो जाए और उनके आदर्शो को कभी न हासिल हो सकने वाली ऊंचाई मानकर त्याग दिया जाए। कभी मजाक में, तो कभी पूरी गंभीरता के साथ गांधी इस बारे में लोगों को लगातार सतर्क करते रहे। गांधी वांग्मय में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां उन्होंने लोगों को अपने ढंग से बताया कि वे उन्हें भगवान बनाने से बाज आएं। यह बात सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं थी। अमेरिका में एक बालक गंभीर रूप से बीमार था। उसने भारत में गांधी के चमत्कार के बारे में सुनकर उन्हें एक पत्र लिखा। उसका कहना था, ‘मैंने आपके बारे में बहुत कुछ सुना और पढ़ा है। मुझे मालूम है कि आपने किस तरह लोगों को एकजुट कर दिया। उन्हें हौसला दिया कि वे अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ बिना हथियार के खड़े हो सकते हैं। यह चमत्कार आप ही कर सकते थे। मेरे जीवन में भी कई तरह की समस्याएं हैं। मैं चाहता हूं कि आप आशीर्वाद देकर मुझे इससे मुक्त कर देंगे। गांधी ने इस पत्र का तत्काल जवाब दिया, ‘मैं कोई चमत्कार नहीं करता और न ही मेरे पास कोई ईश्वरीय शक्ति है। अगर तुम अपने मन में ठान लो कि तुम्हें स्वस्थ होना है तो कोई ताकत तुम्हें बीमार नहीं रख सकती। यह घटना 1930 की है। उस समय महात्मा गांधी ऐतिहासिक दांडी मार्च के दौरान साबरमती आश्रम से ओलपाड और नवसारी होते हुए दांडी समुद्र तट की ओर जा रहे थे, जहां उन्हें नमक कानून तोड़ना था। इस रास्ते में एक मंदिर है, जहां गांधी की प्रतिमा स्थापित है और कोई व्यक्ति हर शाम वहां दिया जला जाता है। यह मंदिर उस स्थान से ज्यादा दूर नहीं है, जहां गांधी दिन भर की यात्रा के बाद रात्रि विश्राम के लिए रुके थे। गांधी के बारे में सच अपनेआप में खासा आश्चर्यजनक होता था और उस सच के किस्से बढ़ते-बढ़ते चमत्कार बन जाते थे। महात्मा गांधी को साढ़े तीन बजे सुबह उठकर चिट्ठियों का जवाब देने की आदत थी। उनके निजी सचिव महादेव देसाई लालटेन जलाकर वहां रख दिया करते थे। उस दिन तेज हवा चली और लालटेन बुझ गई। लालटेन रखने के बाद देसाई फिर सो जाते थे और डेढ़ घंटा बाद उठते थे, जब गांधी नहाकर प्रार्थना सभा के लिए जाते थे। महादेव देसाई उठकर आए, तो देखा कि गांधी अंधेरे में बैठे कुछ लिख रहे हैं। उन्होंने शिकायती अंदाज में कहा कि लालटेन जलाने के लिए उन्हें बुलाया क्यों नहीं, गांधी ने कहा, ‘लिखने के लिए रोशनी की जरूरत नहीं होती, पढ़ने के लिए होती है। यह बात भी सत्याग्रहियों के बीच चमत्कार के रूप में फैल गई। इन सबसे अलग एक और घटना दांडी यात्रा के समय ही घटी। अपनी यात्रा के दौरान गांधी कुछ गांवों में ठहरते थे और कुछ जगह ठहरने से इनकार कर देते थे। इसी संदर्भ में उन पर आरोप लगा कि वह जान-बूझकर मुस्लिम बहुल गांव में नहीं जाते। गांधी ने कई दिन बाद इसका जवाब दिया और कहा कि वह उन्हीं गांवों में ठहरते हैं, जहां के लोग उन्हें आमंत्रित करते हैं। वह किसी पर बोझ नहीं बनना चाहते। इसी सिलसिले में उन्होंने बताया कि छह अप्रैल को नमक कानून तोड़ने के लिए वह दांडी में अपने मुसलमान दोस्त के घर से जाएंगे क्योंकि उसने उन्हें आमंत्रित किया है। एक दिन गांधी एक गांव में रुके। वह एक दलित बस्ती थी। बस्ती के बाहर एक कुंआ था। पेड़ के नीचे सत्याग्रहियों ने डेरा डाला क्योंकि आसपास पेड़ों की वजह से छाया थी और बगल में कुंआ था, जिससे आसानी से पानी मिल सकता था। गांधी नहाने की तैयारी कर रहे थे कि महादेव भाई देसाई ने आकर बताया कि कुंआ सूखा है, उसमें पानी नहीं है। दूसरा कुंआ गांव से बाहर दो मील दूर है। गांधी ने वहीं रुकने का फैसला किया और सत्याग्रहियों को भोजन से पहले मुंह-हाथ धोने के लिए दो मील दूर जाना पड़ा। शाम को सत्याग्रही अगले ठिकाने के लिए रवाना हो गए। अगले गांव में, जहां गांधी ठहरे थे, अचानक गाने-बजाने की आवाजें आने लगीं। पिछली दलित बस्ती से चालीस-पचास लोग थालियां-बर्तन बजाते और गाते हुए बाहर जमा हो गए थे, क्योंकि उनके कुंए में अचानक सोता फूटने से पानी आ गया था। वे गांधी को धन्यवाद देने आए थे कि उनकी वजह से गांव को फिर से पानी नसीब हो गया और अब उन्हें रोजमर्रा की जरूरत के लिए पानी लेने दो मील नहीं जाना पड़ेगा। महादेव देसाई ने यह बात गांधी को बताई। गांधी उठकर झोपड़ी से बाहर आए। वह इस बात की गंभीरता और खतरे को समझ रहे थे। यह भी समझ रहे थे कि इसे तत्काल खारिज न करने पर उन पर ईश्वरत्व लादे जाने का खतरा बढ़ जाएगा। उन्होंने गांव वालों को बहुत डांटा और वापस जाने के लिए समझाते हुए एक किस्सा सुनाया। गांधी ने कहा कि और जो कुछ भी हो, कुंए में पानी आने का श्रेय उन्हें देना, सर्वथा गलत है। गांधी ने कहा, ‘अगर कव्वा किसी पेड़ पर बैठे और पेड़ गिर जाए, तो वह कव्वे के वजन से नहीं गिरता। मुझे कोई गलतफहमी नहीं है और आपको भी नहीं होनी चाहिए।

Monday, August 24, 2009

एक माया मिस्र की

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अपनी मूर्तियों के कारण सुर्खियों और विवाद में हैं। अमरत्व की कामना, इतिहास में गुम हो जाने की आशंका और अपने को समाज पर थोपने की कोशिश कम ही कामयाब होती है। मिस्र की महिला बादशाह हातशेपसत की कहानी भी कुछ यही बताती है। उसे भी यही खौफ था कि इतिहास कहीं मुझे भुला न दे। उसने भी मूर्तियां बनवाईं। 1458 ईसा पूर्व हातशेपसत की मृत्यु हुई तब शासक बने उनके सौतेले बेटे ने अपनी मां के सारे स्मारक नष्ट करने का आदेश दिया। शाही मैदान से उसकी ममी भी हटवा दी। फिर भी हातशेपसत का नाम जिंदा है। तो क्या इतिहास को मिटा देने की कोशिश समाज में अपनी स्वीकार्यता थोपने की तरह ही नाकाम रहती है!



कई बार ऐसा लगता है कि कुछ चीजें पहली बार हो रही हैं और ऐसी चीजों के लिए ‘इतिहास अपने को दोहराता है एक बेमानी कथन है। दरअसल, इसकी असली वजह शायद यह है कि इतिहास की हमारी समझ और पीछे जाकर चीजें टटोलने की क्षमता सीमित है। जैसे ही इतिहास का कोई नया पन्ना खुलता है, पता चलता है कि आज जो हो रहा है, वह कोई नई बात नहीं है। दुनिया ऐसे लोग और उनकी बेमिसाल सनक पहले भी देख चुकी है। दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक मिस्र की सभ्यता है, जिसका लिखित इतिहास सवा पांच हजार साल पुराना है। उसके प्राचीनतम साक्ष्य तीन हजार वर्ष ईसा पूर्व से पहले के हैं। उसकी वंश परंपरा पांच हजार साल पहले शुरू होती है और लगातार तीन हजार साल तक चलती है। इसी परंपरा में बीस वर्ष का एक ऐसा कालखंड आता है, जिसमें मिस्र की बादशाहत एक महिला के हाथ में थी। सामाजिक स्थितियों और परंपराओं में महिला शासक की स्वीकार्यता नहीं थी। इसलिए उस ‘महिला बादशाह-हातशेपसत को तकरीबन पूरा कार्यकाल पुरुष बनकर पूरा करना पड़ा। इस घटना का उल्लेख दस्तावेजों में है कि उसे ‘शी किंग कहा जाता था। हातशेपसत का कार्यकाल असाधारण उपलब्धियों वाला था। वह एक कुशल शासक थी। नई इमारतें तामीर कराने में उसकी दिलचस्पी थी। राजकाज से आम लोगों को कोई शिकायत नहीं थी। बल्कि उसके बीस साल के कार्यकाल को मिस्र के स्वर्णिम युग की तरह याद किया जाता है। हातशेपसत का कार्यकाल 1479 से 1458 ईसा पूर्व में था। एक अध्ययन के अनुसार, हातशेपसत की मां अहमोज एक राजा की पुत्री थी। उसके पिता टुटमोज प्रथम सही मायनों में राजशाही खानदान के नहीं थे। इसकी वजह से हातशेपसत को थोड़ी सामाजिक स्वीकार्यता मिली, जिसका फायदा उठाकर उसने अपने पति के निधन के बाद सत्ता पर कब्जा कर लिया। हालांकि टुटमोज प्रथम ने अपने सौतेले बेटे को गद्दी सौंपी थी लेकिन वह कभी सत्ता में रह नहीं पाया। पूरा इतिहास कुछ इस तरह गडमड था कि हातशेपसत की मौजूदगी और बेहतरीन सत्ता संचालन के बावजूद उसे स्थापित करने के ठोस प्रमाण नहीं मिल रहे थे। कुछ अमेरिकी और मिस्री विद्वानों को अचानक एक दिन एक खुली कब्र मिली, जिसके बाहर एक ममी पड़ी थी। यह अनुमान लगाना किसी के लिए भी असंभव होता कि मिस्र के शासक रह चुके किसी व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार हो सकता है कि उसकी ममी खुले में पड़ी हो। यह बात सौ साल पुरानी है। करीब 75 साल पहले एक और मिस्री विद्वान को उस ममी के पास सोने के गहने मिले। इससे उसे संदेह हुआ कि यह ममी किसी साधारण व्यक्ति की नहीं हो सकती। पूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया के बावजूद ममी का काफी हिस्सा नष्ट हो गया था और ले-देकर एक दांत सही सलामत मिला। उसी दांत के सहारे हातशेपसत की पहचान हुई और फिर उस ममी को सम्मानपूर्वक स्थापित किया गया। हातशेपस का शासन दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। पहले हिस्से में करीब छह वर्ष तक वह टुटमोज द्वितीय के बेटे के उत्तराधिकारी के रूप में शासन करती रही। सारे फैसले उसके होते थे लेकिन नाम उस नाबालिग बच्चे का रहता था। छह साल बाद हातशेपसत ने नाबालिग टुटमोज तृतीय को बेदखल कर दिया और खुद सत्ता संभाल ली। इसके बावजूद महिला के रूप में समाज के सामने जाने का साहस हातशेपसत नहीं जुटा सकी और हमेशा पुरुषों के कपड़े पहनती रही। इतना ही नहीं, उस समय की तमाम प्रतिमाओं में भी उसे पुरुष की तरह चित्रित किया गया। शक्तिशाली फरोहा होने के बावजूद समाज द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के डर की वजह से हातशेपसत में एक तरह का जटिल व्यक्तित्व विकसित हुआ। उसे यह डर हमेशा लगा रहता था कि ताकतवर पुरुष प्रधान मिस्री समाज उसे खारिज कर देगा। उसका योगदान भुला देगा और उसका अस्तित्व इतिहास से मिटा दिया जाएगा। साढ़े तीन हजार साल पुरानी इस इतिहास-कथा ने हातशेपसत के इसी डर और चिंता के कारण एक नया मोड़ लिया। उसने तय कर लिया कि आगे का पूरा शासन वह एक पुरुष फरोहा की तरह चलाएगी और एक अभियान चलाकर समाज में अपनी छवि एक पुरुष की तरह स्थापित करेगी। उसकी बाद की प्रतिमाओं में उसके महिला होने के संकेत तक नहीं मिलते बल्कि चेहरे पर दाढ़ी भी दिखती है। ऐसे कई दस्तावेज मिलते हैं, जिसमें हातशेपसत ने कहा कि वह शासन करने के लिए भेजी गई ईश्वरीय देन है। इसी दौरान उसने यह फैसला लिया कि पूरे साम्राज्य में उसकी विराट प्रतिमाएं लगाई जाएंगी, ताकि किसी को उसके फरोहा होने पर संदेह न रह जाए। मिस्र के छोटे से छोटे इलाके तक संदेश भेजे गए कि हातशेपस बादशाह है और कोई उसे चुनौती देने की कोशिश न करे। इसी के साथ उसने एक शब्द गढ़ा, जिसे रेख्त कहते थे और इसका अर्थ था-आम लोग। मिस्र की जनता को हातशेपसत प्राय: मेरे रेख्त कहती थी और हर फैसला यह कहकर करती थी कि रेख्त की राय यही है। लोकप्रियता हासिल करने की सारी सीमाएं हातशेपसत ने तोड़ दीं। हातशेपसत ने लगभग बीस साल के अपने शासन के दौरान हमेशा यह ख्याल रखा कि उसके किसी फैसले पर नील नदी के दोनों ओर बसे रेख्त की राय क्या होगी। एक दस्तावेज में उसने यहां तक लिखा कि अगर रेख्त की मर्जी नहीं होगी तो मेरा दिल धड़कना बंद कर देगा। हातशेपसत की मृत्यु 1458 ईसा पूर्व में हुई, जिसके बाद उसके सौतेले बेटे टुटमोज तृतीय ने उन्नीसवें फरोहा के रूप में सत्ता संभाली। अपनी सौतेली मां की तरह टुटमोज तृतीय को भी स्मारक बनाने का शौक था। मुर्गी को भोजन की तरह इस्तेमाल करने की परंपरा उसी ने शुरू की और उन्नीस साल के शासन में सत्रह सैनिक अभियान चलाए और कामयाब रहा। अपने शासनकाल के अंतिम दौर में उसने अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट होकर आराम से रहने की जगह एक अजीबोगरीब फैसला किया। यह फैसला था-अपनी सौतेली मां हातशेपसत द्वारा निर्मित सारे स्मारक और उसकी सारी प्रतिमाएं नष्ट कर देने का ताकि इतिहास में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। टुटमोज तृतीय अपने इस अभियान में भी सफल रहा और अपनी सौतेली मां को उसने साढ़े तीन हजार साल के लिए इतिहास से गायब कर दिया। इतना ही नहीं, उसने अपनी सौतेली मां की ममी को भी फरोहा के शाही मैदान से हटा दिया। उसे एक ऐसी जगह ले जाकर रखा, जहां किसी को संदेह ही न हो कि वह हातशेपसत हो सकती है। निश्चित तौर पर अमरत्व की कामना, इतिहास में खो जाने के डर और समाज में अपनी स्वीकार्यता थोपने की कोशिश में किए गए प्रयास कभी पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकते। लेकिन साथ ही यह भी लगता है कि इतिहास को नष्ट करने या उसे मिटा देने की कोशिश भी उतनी ही नाकामयाब होती है।

Sunday, August 2, 2009

गंगा जसी पवित्र गायकी


यह एक अद्भुत संयोग है कि कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों तरह की संगीत धाराओं का गढ़ कर्नाटक में ही है। अंतर सिर्फ इतना है कि हिंदुस्तानी संगीत कर्नाटक को बीच से काटने वाली तुंगभद्र नदी के उत्तर में पनपा और बढ़ा जबकि कर्नाटक संगीत नदी के दक्षिण में। हिंदुस्तानी संगीत की गायकी के लगभग सारे बड़े नाम उत्तरी कर्नाटक में एक-दूसरे से सटे तीन जिलों से आते हैं, जिनमें धारवाड़, हुबली और बेलगांव शामिल हैं। सवाई गंधर्व, कुमार गंधर्व, बसवराज राजगुरु, मल्लिकार्जुन मंसूर, भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल और राजशेखर राजगुरु सब के सब इसी धरती की देन हैं। गंगूबाई अपने परिवार में पहली गायिका नहीं थीं लेकिन उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि शास्त्रीय गायकी के लिए बहुत अनुकूल नहीं थी। यह बात भी उनके खिलाफ जाती थी कि वे महिला होकर शास्त्रीय संगीत की पुरुष प्रधान बिरादरी में दाखिल होना चाहती थीं। गंगूबाई की मां अंबाबाई, यहां तक कि उनकी दादी भी देवदासी परंपरा से आती थीं और मंदिरों में गायन उनके लिए सहज-सामान्य था लेकिन मंदिर के बाहर सार्वजनिक मंच से शास्त्रीय गायन उतना ही कठिन। गंगूबाई का गायन आठ दशक में फैला हुआ है लेकिन शायद गायकी की पुख्तगी से ज्यादा बड़ी बात यह है कि उन्होंने तमाम तरह की विषमताएं ङोलते हुए अपना मुकाम हासिल किया। कन्नड़ में लिखी अपनी आत्मकथा मेरा जीवन संगीत में गंगूबाई ने इसका विस्तार से हवाला दिया है और लिखा है कि उन्हें ऊंची जातियों के शुक्रवार पेठ मोहल्ले से निकलते हुए किस तरह की फब्तियां सुननी पड़ती थीं। उन्हें बाई और कोठेवाली कहा जाता था। गंगूबाई के बचपन के गांव हंगल में मैंने उनका पुश्तैनी घर देखा। सौ साल पहले बने छोटे से अहाते वाले उस घर के पांच टुकड़े हो गए थे, जिस पर बंटवारे के बाद परिवार के लोगों ने अलग-अलग घर बना लिए थे। गंगूबाई की मां के हिस्से में आया टुकड़ा उजाड़ था। खपरैल की छत थी, पर टूटी हुई। सामने के दरवाजे पर ताला लगा था और लकड़ी की दोनों खिड़कियां गायब थीं। मुझे उस घर तक ले गई एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि गंगू उनकी बचपन की सहेली थी लेकिन अब यहां नहीं आतीं। उसने हुबली में घर बनवा लिया है। नई पीढ़ी के बच्चों में ज्यादातर ने उनका नाम नहीं सुना था और कुछ बुजुर्गो में वही हिकारत थी, जिसका जिक्र विषमताओं के रूप में गंगूबाई ने अपनी किताब में किया है। हुबली में गंगूबाई का छोटा सा घर है। सामने बरामदा, अंदर एक आंगन और उसके तीन तरफ बने कमरे। मैंने हंगल और उनके बचपन के बारे में पूछा तो गंगूबाई टाल गईं। बाद में उनकी बेटी और बहू, जो खुद बेहतरीन गायिका हैं, कहा कि बचपन में सामाजिक अपमान का असर मां पर इतना था कि उन्होंने पचपन साल की होने तक बेटी को सार्वजनिक मंच से गाने नहीं दिया। उन्हें वह वाकया कभी नहीं भूला, जब गायन के दौरान श्रोताओं में से किसी ने कहा, ‘गाना बहुत हुआ बाई, अब ठुमका हो जाए।गंगूबाई ने अपनी आत्मकथा में बहुत संयम से लेकिन पीड़ा के साथ लिखा है कि शास्त्रीय संगीत में आज भी महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव होता है। शायद यही वजह है कि बड़ी से बड़ी गायिका बाई होकर रह जाती है जबकि पुरुष उस्ताद और पंडित बन जाते हैं। इस आधार पर कि वे मुसलमान हैं या हिंदू। उन्होंने इस सिलसिले में हीराबाई और केसरबाई का जिक्र किया है। इस बात पर हैरानी होती है कि शास्त्रीय संगीत में महिलाएं ऊंचे घरानों से क्यों नहीं आईं और जहां से आईं, उनकी स्वीकार्यता इतनी आसान क्यों नहीं थी। इसमें हीराबाई बारोडकर, केसरबाई केरकर, जद्दनबाई, रसूलनबाई और अख्तरीबाई के नाम उल्लेखनीय हैं। समाज ने बहुत बाद में केवल अख्तरीबाई को थोड़ी इज्जत बख्शी और उन्हें बेगम अख्तर कहा जाने लगा। गंगूबाई का संबंध किराना घराने से था, जिसके उस्ताद अमीर खां मीरज में रहते थे। गंगूबाई की मां अंबाबाई जब अपने घर में गाती थीं तो उस्ताद अब्दुल करीम खां उन्हें सुनने आते थे। गंगूबाई के गुरु सवाई गंधर्व और हीराबाई भी अंबाबाई की गायकी के प्रशंसकों में थीं। धारवाड़ में अंबाबाई को सुनने के लिए उनके घर के बाहर भीड़ जमा हो जाती थी। अंबाबाई ने अपनी बेटी को संगीत की तालीम देने की जिम्मेदारी सवाई गंधर्व को सौंप दी, जिसके लिए गंगूबाई को 30 मील दूर जाना पड़ता था। वहां उनके गुरुबंधु थे पंडित भीमसेन जोशी। उस जमाने में दिन में सिर्फ दो बार रेल चलती थी जो धारवाड़ को सवाई गंधर्व के गांव से जोड़ती थी। यानी कि गाड़ी छूट जाए तो रात स्टेशन पर ही बितानी पड़ती। भीमसेन जोशी वापसी में अक्सर गंगूबाई को घर तक छोड़ने आते थे। फिरोज दस्तूर भी उन दिनों वहीं थे। सवाई गंधर्व ने गंगूबाई को सिखाने में ख्याल पर जोर दिया और चाहा कि वह सात रागों पर महारत हासिल करें। जाहिर है, गंगूबाई के पास गायकी में भीमसेन जोशी जसी विविधता नहीं है लेकिन भैरवी, आसावरी, भीमपलासी, केदार, पूरिया धनाश्री और चंद्रकौंस में विलंबित में जिस तरह का राग विस्तार उनके पास है वह जोशी और दस्तूर के पास भी नहीं। अपनी हर रचना को प्रार्थना कहने वाली गंगूबाई की सिर्फ एक ख्वाहिश अधूरी रह गई कि वह सौ साल जीना चाहती थीं। प्रकृति ने उन्हें तीन और वर्ष नहीं दिए लेकिन उनकी अंदर तक धो देने वाली गंगाजल जसी पवित्र गायकी किसी की कृपा की मोहताज नहीं है। वह सैकड़ों साल जिंदा रहेगी।

Monday, May 11, 2009

कालजयी गायकी का पांचवां स्तंभ

इकबाल बानो ने पचास हजार लोगों के सामने फैज की नज्म ‘हम देखेंगेज् गाई और गाना खत्म होने तक यह वाकया एक आंदोलन में बदल गया।

पक्के गाने छोड़ दिए जाएं तो दक्षिण एशिया में कालजयी गायकी के पांच स्तंभ नजर आते हैं। वह गायकी जो अपनी पीढ़ी में तो मिसाल थी ही, आज भी है और सदियों तक रहेगी। इस गायकी में सिर्फ अदायगी, तमीज, तहजीब और तलफ्फुज नहीं है बल्कि कुछ ऐसा भी है, जो सीधे नब्ज पर हाथ रखता है और अंदर तक झकझोर देता है। इसने अपने मेयार खुद तय किए हैं। चाहे वह इश्क हो, कि फलसफा या फिर प्रतिरोध और जिंदगी की शर्ते। इकबाल बानो इन पांच स्तंभों में से एक थीं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं।कालजयी गायकी के शिखर पर जिन पांच गायकों और उनके पसंदीदा कलाम को रखा जाएगा, उनके बीच बराबरी का रिश्ता है। मेरी नजर में नूरजहां का ‘मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग, मेहदी हसन का ‘रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ, नुसरत फतेह अली खान का ‘तुम एक गोरखधंधा हो, बेगम अख्तर का, ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे और इकबाल बानो का ‘हम देखेंगें लाजिम है कि हम भी देखेंगे इस गायकी के शिखर पर हमेशा रहेंगे। इकबाल बानो के गुजर जाने के बाद इन पांच स्तंभों में से चार अब दुनिया में नहीं हैं। मेंहदी हसन हयात हैं पर अस्पताल में हैं और उनकी हालत ठीक नहीं है। मोहतरमा इकबाल बानो दिल्ली की थीं। बचपन यहीं गुजरा। आठ साल की उम्र में उनके एक रिश्तेदार ने किसी तरह उनके पिता को राजी किया कि वह बानो को संगीत सीखने दें क्योंकि ‘उसकी आवाज में कशिश और एक बेहद अलग ढंग की रूमानियत है। मोहतरमा ने उस्ताद चांद खां से तालीम पाई, जो दिल्ली घराने के माहिर गायक थे। चांद खां की सिफारिश पर इकबाल बानो ने अपनी पहली ठुमरी ऑल इंडिया रेडियो में रिकार्ड कराई। तेरह साल की उम्र में पहला सार्वजनिक कार्यक्रम पेश किया और पचास के दशक में वह एक जानी-मानी शख्सियत बन चुकी थीं। हालांकि इसी बीच 1952 में उनकी शादी हुई और वह पाकिस्तान चली गईं। इकबाल बानो के शौहर ने उन्हें गाने से नहीं रोका और इसी दौरान वह पाकिस्तानी फिल्मों की सबसे बड़ी पाश्र्वगायिका बन गईं। ‘गुमनाम, ‘कातिल, ‘सरफरोश और ‘नागिन के उनके गीत आज भी लोकप्रिय हैं।अपने शौहर के इंतकाल के बाद इकबाल बानो लाहौर चली गईं और अंतिम दिनों में वहीं रहीं। लाहौर से उनका रिश्ता अलग तरह का था। यह वही शहर था, जिसने इकबाल बानो को पाकिस्तान में प्रतिरोध की सबसे मुखर आवाज बना दिया। यह बात 1985 की है। पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक का फौजी शासन था और तमाम कलाकारों पर प्रतिबंध लगा हुआ था। फैज अहमद फैज जेल में थे और उनकी शायरी गाने पर रोक थी। इकबाल बानो ने पचास हजार लोगों के सामने फैज की नज्म ‘हम देखेंगे, लाजिम हम देखेंगे गाई और गाना खत्म होने तक यह वाकया एक आंदोलन में बदल गया। नारे लगने लगे। उस नज्म की कुछ पंक्तियां थीं : ‘जब अर्जे खुदा के काबे से/सब बुत उठवाए जाएंगे/हम अहले सफा मरदूदे हरम/मसनद पर बिठाए जाएंगे/सब ताज उछाले जाएंगे/सब तख्त गिराए जाएंगे/हम देखेंगे/लाजिम है कि हम भी देखेंगे।फैज की एक और नज्म को इकबाल बानो ने अपनी आवाज से लोगों के दिलों में उतार दिया। ‘आइए हाथ उठाएं हम भी/हम जिन्हें रस्में दुआ याद नहीं/हम जिन्हें सोजे मुहब्बत के सिवा/कोई बुत/कोई खुदा याद नहीं। उनकी गायकी में बाकी सिद्दीकी की गजल ‘दागे दिल हमको याद आने लगे ने एक नई ऊंचाई अदा की। मोहतरमा की शिक्षा मूलत: गजल, ठुमरी और दादरा में थी और नज्मों की अदायगी में उन्हें इसका पूरा फायदा मिला। अपनी चौहत्तर साल की जिंदगी में साठ साल गायकी को समर्पित करने वाली इकबाल बानो को अपने कद और लोकप्रियता का अंदाजा था, पर उन्होंने समाज के साथ रिश्ते के बीच इसे कभी आड़े नहीं आने दिया।इकबाल बानो की लोकप्रियता केवल उर्दूभाषी हिंदुस्तान और पाकिस्तान तक सीमित नहीं थी। फारसी पर उनकी गहरी पकड़ और फारसी संगीत की समझ की वजह से वह ईरान, मध्यपूर्व के देशों तथा अफगानिस्तान में खासी चर्चित थीं। फारसी में ‘हाफिज और ‘बेदिल की शायरी में उनकी आवाज ने जादुई असर पैदा कर दिया। बेहतरीन अदायगी और समाज के साथ अपने सरोकारों के चलते मोहतरमा इकबाल बानो उस मुकाम पर पहुंच गईं, जिसकी वह सचमुच हकदार थीं। जिसने इकबाल बानो को नहीं सुना, उसने पूरी एक पीढ़ी की आवाज नहीं सुनी। उस आवाज को हमारा सलाम।

Monday, March 30, 2009

कांग्रेस की कवायद

ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी ने जानबूझकर अपनी मुश्किलें बढ़ाने का फैसला कर लिया है। हालांकि पार्टी के कुछ नेता कहते हैं कि यह कांग्रेस की दूरगामी सोच का परिणाम है, क्योंकि वह अब से ज्यादा 2014 के बारे में सोच रही है। इस तर्क को पचा पाना आसान नहीं लगता, लेकिन जिस तरह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बिखर रहा है, इसे देखना कठिन नहीं है। कांग्रेस ने 29 जनवरी को अपनी कार्य समिति की बैठक में यह फैसला कर लिया था कि वह राष्ट्रीय स्तर पर एकला चलो रे के सिद्धांत पर चुनाव लड़ेगी और अन्य राजनीतिक दलों के साथ राज्य स्तर पर सीमित समझौते किए जाएंगे।इसी निर्णय का परिणाम बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी की तीन सीट लेने की शर्त न मानने के रूप में हुआ और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ उसकी मैराथन वार्ता टूट गई। तमिलनाडु में पीएमके के अलग हो जाने से कांग्रेस की हालत खराब ही होगी। एक तरह से देखा जाए, तो 543 सदस्यों की लोकसभा में कांग्रेस केवल 383 सीट पर चुनाव लड़ रही है। उत्तर प्रदेश की 80, बिहार की 40 और तमिलनाडु तथा पुड्डुचेरी की एक सीट मिलाकर कुल 40 सीट पर उसके लिए चुनाव लड़ना, न लड़ना बराबर ही होगा। यह संख्या 160 बनती है, जहां से कांग्रेस पार्टी को बमुश्किल 10 सीट मिल सकती हैं। यह जरूर है कि कांग्रेस इन सभी सीटों पर प्रत्याशी खड़ा करेगी, लेकिन उम्मीद का दामन उम्मीदवार के हाथ शायद ही आए।कांग्रेस ने सभी 543 सीट पर एक सर्वेक्षण कराया है और पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक उसे अपने तौर पर 150 सीट मिल सकती है। पार्टी को उम्मीद है कि यह आंकड़ा उसे पंद्रहवीं लोकसभा में सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनाने के लिए पर्याप्त होगा, क्योंकि बाकी दलों की स्थिति इससे खराब रहने वाली है। निश्चित रूप से 150 सीट का यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु में उसे अपनी सही स्थिति का अंदाजा कराता है। हालांकि वहां तक पहुंचना भी आसान नहीं है। पार्टी के सर्वेक्षण में उसे सबसे ज्यादा फायदा पश्चिम बंगाल, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा से मिलता दिखाया गया है।दरअसल 29 जनवरी की कार्य समिति की बैठक के बाद संप्रग का बिखराव अचानक बहुत तेज हो गया। जनवरी के अंत तक चट्टान की तरह संप्रग के साथ खड़ा रहने का दावा करने वाले उसके कई सहयोगी दलों में वह प्रतिबद्धता हल्की पड़ने लगी और दो महीने में पांच साल तक सरकार चलाने वाला वह संप्रग टुकड़े-टुकड़े हो गया, जिसे 2004 में संप्रग और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ईंट-ईंट जोड़कर खड़ा किया था। संप्रग को बचाने या उसमें नए दलों को जोड़ने में सोनिया गांधी की तत्परता भी इस बार नजर नहीं आ रही।जनवरी के अंत के संप्रग की तस्वीर मार्च के अंत तक इतनी बदल गई कि उसकी पहचान भी मुश्किल हो गई। कुछ छोटे दलों और समूहों को छोड़ दिया जाए, तो संप्रग से किनारा करने वाले दलों की संख्या उसके साथ टिके रहने वाली पार्टियों से चार गुना ज्यादा है। यह केवल उत्तर या दक्षिण तक सीमित नहीं है, इसका असर चौतरफा हुआ है। संप्रग से हटने या चुनावी जंग में किनाराकशी करने वाले दलों में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी, पीडीपी, एमडीएमके, पीएमके और तेलंगाना राष्ट्र समिति शामिल है। निश्चित तौर पर कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना होगा। उसके साथ बचे दलों में मुख्य रूप से केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और डीएमके का नाम लिया जा सकता है।सवाल यह उठता है कि आखिर 29 जनवरी की कार्य समिति की बैठक में संप्रग के बिखराव की आशंका व्यक्त किए जाने के बावजूद पार्टी ने सहयोगी दलों को नाराज करने की हद तक जाकर ऐसा फैसला क्यों किया कि वह अधिकतर सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेगी। इस निर्णय में 2009 के चुनाव की तात्कालिकता नहीं थी, लेकिन पार्टी ने इसे भविष्य के बारे में सोचते हुए कड़वी दवा की तरह पीने का फैसला किया।कार्य समिति में यह बात भी सामने आई कि कांग्रेस को बचाए रखने के लिए जरूरत होने पर पार्टी को अन्य विकल्पों के साथ विपक्ष में बैठने के लिए तैयार रहना चाहिए। पार्टी ने इसे पराजय की मानसिकता की जगह भविष्य दृष्टि के रूप में देखने की दलील दी। इससे तो यही लगता है कि उसकी नजर 2009 पर नहीं, बल्कि उसके आगे है। लालू यादव ने इस संबंध में टिप्पणी की थी कि पार्टी 2009 का चुनाव नहीं लड़ रही, 2014 की तैयारी कर रही है।एक तरह से देखा जाए, तो शायद गठबंधनों के साथ चुनाव लड़ने और क्षेत्रीय दलों की इनायत पर तीन या पांच सीट लेने पर अगले चुनाव तक कांग्रेस का कम से कम उत्तर भारत से पूरी तरह सफाया हो जाता। पार्टी ने संभवत: इसीलिए जीत से ज्यादा महत्व मौजूदगी को दिया। आजाद भारत के 60 में से लगभग 50 वर्ष सत्ता में रहने वाली कांग्रेस पार्टी के लिए यह फैसला आसान नहीं रहा होगा। लेकिन सच्चाई यही है कि अगर कांग्रेस ने यह निर्णय न किया होता, तो बतौर राष्ट्रीय पार्टी, यह उसका आखिरी चुनाव होता।