Thursday, May 27, 2010
पूरे देश का यह चित्र
Wednesday, May 26, 2010
Monday, April 5, 2010
Monday, March 29, 2010
Saturday, February 20, 2010
कूटनीति में यही होता है
मुलाकातें हमेशा अर्थवान। अपने ही अंदाज में। साधारण से लेकर असाधारण तक। कभी नाते-रिश्तेदार। दोस्त अहबाब। मेले में बिछड़े दो भाई। या कोई स्वार्थ। सौदा। फायदा। कभी-कभी दो धुरंधर। जसे शांति के नोबल पुरस्कार विजेता। दिक्कत अर्थ में है। मुलाकात में नहीं। अर्थ हो सकते हैं एक से ज्यादा। इसीलिए। देखने का नजरिया अलग। उसी से बदलता मानी। वरना हर्ज क्या था। दलाई लामा और ओबामा। एक साथ। ह्लाइट हाउस में। तिब्बती खुश थे। खुशी के आंसू। चीन नाराज। बेतरह। यह मुलाकात उसके लिए हस्तक्षेप। कूटनीति में यही होता है। बहुअर्थी।
Friday, February 12, 2010
हे भोले भंडारी! गौरापति

हे भोले भंडारी! गौरापति। गंगाधर। देवाधिदेव। महादेव। यह तो तुम ही हो। अजब-गजब। सामान्य समझ से परे। तीनों काल हिल जाते हैं। तुम्हारे डमरू से। अतीत, भविष्य और वर्तमान। गूंजती है। वही ध्वनि। विभिन्न अर्थो के साथ। गोपेश्वर की तरह। गोपियों की लीला में। नीलकंठ बनकर। हलाहल पीते। ताकि सिर्फ अमृत रहे बचा। सबके लिए। विवाह मंडप में। धरती से कैलाश तक। हर रूप विलक्षण। कल्याणकारी। जो भी है सत पथ अनुगामी। यह दिन तुम्हारा। रात्रि भी। बल्कि समस्त चराचर। कृपा बनाए रखना। आज और हमेशा। हम पर। और सब पर। जो हमारे साथ हैं।
Tuesday, February 9, 2010
बेरहम और निहायत खतरनाक, वही बर्फ

प्रकृति का अपना नियम-कानून। उसकी हर छटा। हर अदा। तस्वीर सी। समंदर से लेकर पहाड़ तक। लेकिन जो सुंदर है। स्निग्ध, सौम्य और शांत। वही हो सकता है जानलेवा। बेरहम और निहायत खतरनाक। वही बर्फ। सफेद चादर सी। रुई के फाहों सी हल्की। इंतजार करते हैं सब। कि खेल सकें। प्रकृति की देन मानकर। नाराज हो प्रकृति। गुस्सा आए उसे। जसे हिमस्खलन। खिलनमर्ग से आगे। दरक गया पहाड़। आ गिरा नीचे। धड़ाम से। तब क्या करें। सिवाय प्रार्थना के। हे वसुधा! बनाए रखना कृपा हम पर। तुम तो मां हो। ऐसी सजा मत दो। अपनी संतानों को।
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