Monday, May 11, 2009

कालजयी गायकी का पांचवां स्तंभ

इकबाल बानो ने पचास हजार लोगों के सामने फैज की नज्म ‘हम देखेंगेज् गाई और गाना खत्म होने तक यह वाकया एक आंदोलन में बदल गया।

पक्के गाने छोड़ दिए जाएं तो दक्षिण एशिया में कालजयी गायकी के पांच स्तंभ नजर आते हैं। वह गायकी जो अपनी पीढ़ी में तो मिसाल थी ही, आज भी है और सदियों तक रहेगी। इस गायकी में सिर्फ अदायगी, तमीज, तहजीब और तलफ्फुज नहीं है बल्कि कुछ ऐसा भी है, जो सीधे नब्ज पर हाथ रखता है और अंदर तक झकझोर देता है। इसने अपने मेयार खुद तय किए हैं। चाहे वह इश्क हो, कि फलसफा या फिर प्रतिरोध और जिंदगी की शर्ते। इकबाल बानो इन पांच स्तंभों में से एक थीं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं।कालजयी गायकी के शिखर पर जिन पांच गायकों और उनके पसंदीदा कलाम को रखा जाएगा, उनके बीच बराबरी का रिश्ता है। मेरी नजर में नूरजहां का ‘मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग, मेहदी हसन का ‘रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ, नुसरत फतेह अली खान का ‘तुम एक गोरखधंधा हो, बेगम अख्तर का, ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे और इकबाल बानो का ‘हम देखेंगें लाजिम है कि हम भी देखेंगे इस गायकी के शिखर पर हमेशा रहेंगे। इकबाल बानो के गुजर जाने के बाद इन पांच स्तंभों में से चार अब दुनिया में नहीं हैं। मेंहदी हसन हयात हैं पर अस्पताल में हैं और उनकी हालत ठीक नहीं है। मोहतरमा इकबाल बानो दिल्ली की थीं। बचपन यहीं गुजरा। आठ साल की उम्र में उनके एक रिश्तेदार ने किसी तरह उनके पिता को राजी किया कि वह बानो को संगीत सीखने दें क्योंकि ‘उसकी आवाज में कशिश और एक बेहद अलग ढंग की रूमानियत है। मोहतरमा ने उस्ताद चांद खां से तालीम पाई, जो दिल्ली घराने के माहिर गायक थे। चांद खां की सिफारिश पर इकबाल बानो ने अपनी पहली ठुमरी ऑल इंडिया रेडियो में रिकार्ड कराई। तेरह साल की उम्र में पहला सार्वजनिक कार्यक्रम पेश किया और पचास के दशक में वह एक जानी-मानी शख्सियत बन चुकी थीं। हालांकि इसी बीच 1952 में उनकी शादी हुई और वह पाकिस्तान चली गईं। इकबाल बानो के शौहर ने उन्हें गाने से नहीं रोका और इसी दौरान वह पाकिस्तानी फिल्मों की सबसे बड़ी पाश्र्वगायिका बन गईं। ‘गुमनाम, ‘कातिल, ‘सरफरोश और ‘नागिन के उनके गीत आज भी लोकप्रिय हैं।अपने शौहर के इंतकाल के बाद इकबाल बानो लाहौर चली गईं और अंतिम दिनों में वहीं रहीं। लाहौर से उनका रिश्ता अलग तरह का था। यह वही शहर था, जिसने इकबाल बानो को पाकिस्तान में प्रतिरोध की सबसे मुखर आवाज बना दिया। यह बात 1985 की है। पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक का फौजी शासन था और तमाम कलाकारों पर प्रतिबंध लगा हुआ था। फैज अहमद फैज जेल में थे और उनकी शायरी गाने पर रोक थी। इकबाल बानो ने पचास हजार लोगों के सामने फैज की नज्म ‘हम देखेंगे, लाजिम हम देखेंगे गाई और गाना खत्म होने तक यह वाकया एक आंदोलन में बदल गया। नारे लगने लगे। उस नज्म की कुछ पंक्तियां थीं : ‘जब अर्जे खुदा के काबे से/सब बुत उठवाए जाएंगे/हम अहले सफा मरदूदे हरम/मसनद पर बिठाए जाएंगे/सब ताज उछाले जाएंगे/सब तख्त गिराए जाएंगे/हम देखेंगे/लाजिम है कि हम भी देखेंगे।फैज की एक और नज्म को इकबाल बानो ने अपनी आवाज से लोगों के दिलों में उतार दिया। ‘आइए हाथ उठाएं हम भी/हम जिन्हें रस्में दुआ याद नहीं/हम जिन्हें सोजे मुहब्बत के सिवा/कोई बुत/कोई खुदा याद नहीं। उनकी गायकी में बाकी सिद्दीकी की गजल ‘दागे दिल हमको याद आने लगे ने एक नई ऊंचाई अदा की। मोहतरमा की शिक्षा मूलत: गजल, ठुमरी और दादरा में थी और नज्मों की अदायगी में उन्हें इसका पूरा फायदा मिला। अपनी चौहत्तर साल की जिंदगी में साठ साल गायकी को समर्पित करने वाली इकबाल बानो को अपने कद और लोकप्रियता का अंदाजा था, पर उन्होंने समाज के साथ रिश्ते के बीच इसे कभी आड़े नहीं आने दिया।इकबाल बानो की लोकप्रियता केवल उर्दूभाषी हिंदुस्तान और पाकिस्तान तक सीमित नहीं थी। फारसी पर उनकी गहरी पकड़ और फारसी संगीत की समझ की वजह से वह ईरान, मध्यपूर्व के देशों तथा अफगानिस्तान में खासी चर्चित थीं। फारसी में ‘हाफिज और ‘बेदिल की शायरी में उनकी आवाज ने जादुई असर पैदा कर दिया। बेहतरीन अदायगी और समाज के साथ अपने सरोकारों के चलते मोहतरमा इकबाल बानो उस मुकाम पर पहुंच गईं, जिसकी वह सचमुच हकदार थीं। जिसने इकबाल बानो को नहीं सुना, उसने पूरी एक पीढ़ी की आवाज नहीं सुनी। उस आवाज को हमारा सलाम।

2 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

मधुकर उपाध्‍याय जी को जनसत्‍ता में 9 सितम्‍बर 2009 को संपादकीय पृष्‍ठ पर उनकी यह पोस्‍ट कालजयी गायकी शीर्षक से प्रकाशन के लिए बधाई। आपका ई मेल पता नहीं मिला है इसलिए यहीं लिख रहा हूं। मेरा ई मेल avinashvachaspati@gmail.com है।

vinay said...

बधाई मधुकर उपाध्याय जी