Saturday, February 14, 2009

एक आग का दरिया है और डूब के जाना है


जिंदगी नीरस और उदास हो गई है। सब सूना-सूना लगता है। महसूस होता है कि जो कुछ आसपास है, सब बनावटी है, फर्जी है। काश तुम यहां होते।

मुझे अब भी हवा में तुम्हारी खुशबू का अहसास होता है। मैं तुम्हारे खत बार-बार पढ़ता हूं और सपनों की दुनिया में खो जाता हूं।

ये दोनों खत 1948 में लिखे गए थे। पहला खत लेडी एडविना माउंटबेटन ने दिल्ली छोड़कर लंदन लौटने पर लिखा था और दूसरा भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने। नेहरू और एडविना के बीच प्रेम किस्से-कहानियों की तरह हमेशा हमारे बीच रहा है। लेकिन उनमें कितनी निकटता थी और उनके प्रेमपत्र कैसे होते थे, यह पहली बार सामने आया है। आजादी की लड़ाई के दौरान पनपी और अगले अट्ठारह साल तक चली इस प्रेमकथा ने न केवल दो जिंदगियां बदलीं बल्कि दो मुल्कों का इतिहास बदल दिया। निश्चित रूप से उनके प्रेमपत्रों से लिए गए उपरोक्त अंश प्रेमपत्रों के भारी पुलिंदे की एक झलक भर हैं और अभी बहुत कुछ आना बाकी है। नेहरू और एडविना के पत्र दो परिवारों की निजी संपत्ति हैं और उन्होंने बहुत निजी पत्रों को फिलहाल सार्वजनिक नहीं करने का फैसला किया है। इतिहासकार एलेक्स वॉन तुंजलमान के मुताबिक उन्होंने माउंटबेटन और नेहरू गांधी परिवार से इन पत्रों को देखने देने का बार-बार आग्रह किया, पर दोनों परिवारों ने बहुत शालीन ढंग से इससे इनकार कर दिया। मृत्यु से पहले अपने पत्र लॉर्ड माउंटबेटन को हिफाजत से रखने के लिए भेजते हुए एडविना ने लिखा, ‘‘एक तरह से देखो तो इन्हें प्रेमपत्र कहा जा सकता है। तुम्हें महसूस होगा कि हमारा अजीबोगरीब रिश्ता दरअसल भावनात्मक था। लेकिन मेरी जिंदगी में इसकी अहम जगह है। इन्हें पढ़कर तुम्हें लगेगा कि मैं उन्हें (नेहरू) और वह मुझे कितनी अच्छी तरह समझते थे। एडविना अपने समय में दुनिया की सबसे अमीर महिलाओं में से एक थीं, जिनसे माउंटबेटन की मुलाकात अक्टूबर 1920 में हुई थी। अगले साल माउंटबेटन ने लंदन के उमर खय्याम कैफे में उनसे पहली बार प्रेम का इजहार किया, हालांकि उन्होंने शादी के लिए औपचारिक अनुरोध 1922 में वेलेंटाइन डे के दिन 14 फरवरी को नई दिल्ली में वाइस रीगल लॉज में नृत्य के दौरान किया। एडविना खासतौर पर माउंटबेटन से मिलने लंदन से दिल्ली आई थीं और दोनों की मुलाकात पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई। उस समय माउंटबेटन प्रिंस ऑफ वेल्स के साथ भारत के दौरे पर थे। नेहरू के साथ एडविना के गंभीर प्रेम प्रसंग की शुरुआत मई 1947 में हुई थी। हालांकि इसके पहले दोनों काफी निकट आ चुके थे। एडविना इन संबंधों की सीमाएं जानती थीं। उन्होंने नेहरू को लिखा, ‘‘डिकी माउंटबेटन और तुम अपनी किस्मत से आगे नहीं जा सकते, जैसे कि मैं अपनी किस्मत के दायरे में हूं।

7 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

नेहरू-एडवीना की कहानी अब किसी परीकथा सी लगती है। आज १४ फरवरी को चर्चा करने का धन्यवाद।

आपके बीबीसी के पुराने दिनों में इस प्रेम दिवस पर आपकी रिपोर्ट सुना करता था। अब क्या कर रहे हैं?

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

हुँ!! पहले तो हमको लगा कि आप अपनी बात कर रहे हैं.

मधुकर said...

दोस्तों यह सीरीज आगे भी जारी रहेगी। पढ़ना न भूलें। धन्यवाद

शायदा said...

interesting.

Mired Mirage said...

स्वाभाविक है कि दोनों परिवार नितान्त निजी को सार्वजनिक नहीं करना चाहते।
घुघूती बासूती

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आज आपका लिखा पढ़ा बहुत रोचक है यह जानना .इन्तजार रहेगा इसकी शेष कड़ियों का

कंचन सिंह चौहान said...

अच्छी जानकारी....इससे संबंधित एक पुस्तक पढ़ने के बाद रुचि जागी है मेरी भी...!