Monday, August 24, 2009

एक माया मिस्र की

उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती अपनी मूर्तियों के कारण सुर्खियों और विवाद में हैं। अमरत्व की कामना, इतिहास में गुम हो जाने की आशंका और अपने को समाज पर थोपने की कोशिश कम ही कामयाब होती है। मिस्र की महिला बादशाह हातशेपसत की कहानी भी कुछ यही बताती है। उसे भी यही खौफ था कि इतिहास कहीं मुझे भुला न दे। उसने भी मूर्तियां बनवाईं। 1458 ईसा पूर्व हातशेपसत की मृत्यु हुई तब शासक बने उनके सौतेले बेटे ने अपनी मां के सारे स्मारक नष्ट करने का आदेश दिया। शाही मैदान से उसकी ममी भी हटवा दी। फिर भी हातशेपसत का नाम जिंदा है। तो क्या इतिहास को मिटा देने की कोशिश समाज में अपनी स्वीकार्यता थोपने की तरह ही नाकाम रहती है!



कई बार ऐसा लगता है कि कुछ चीजें पहली बार हो रही हैं और ऐसी चीजों के लिए ‘इतिहास अपने को दोहराता है एक बेमानी कथन है। दरअसल, इसकी असली वजह शायद यह है कि इतिहास की हमारी समझ और पीछे जाकर चीजें टटोलने की क्षमता सीमित है। जैसे ही इतिहास का कोई नया पन्ना खुलता है, पता चलता है कि आज जो हो रहा है, वह कोई नई बात नहीं है। दुनिया ऐसे लोग और उनकी बेमिसाल सनक पहले भी देख चुकी है। दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक मिस्र की सभ्यता है, जिसका लिखित इतिहास सवा पांच हजार साल पुराना है। उसके प्राचीनतम साक्ष्य तीन हजार वर्ष ईसा पूर्व से पहले के हैं। उसकी वंश परंपरा पांच हजार साल पहले शुरू होती है और लगातार तीन हजार साल तक चलती है। इसी परंपरा में बीस वर्ष का एक ऐसा कालखंड आता है, जिसमें मिस्र की बादशाहत एक महिला के हाथ में थी। सामाजिक स्थितियों और परंपराओं में महिला शासक की स्वीकार्यता नहीं थी। इसलिए उस ‘महिला बादशाह-हातशेपसत को तकरीबन पूरा कार्यकाल पुरुष बनकर पूरा करना पड़ा। इस घटना का उल्लेख दस्तावेजों में है कि उसे ‘शी किंग कहा जाता था। हातशेपसत का कार्यकाल असाधारण उपलब्धियों वाला था। वह एक कुशल शासक थी। नई इमारतें तामीर कराने में उसकी दिलचस्पी थी। राजकाज से आम लोगों को कोई शिकायत नहीं थी। बल्कि उसके बीस साल के कार्यकाल को मिस्र के स्वर्णिम युग की तरह याद किया जाता है। हातशेपसत का कार्यकाल 1479 से 1458 ईसा पूर्व में था। एक अध्ययन के अनुसार, हातशेपसत की मां अहमोज एक राजा की पुत्री थी। उसके पिता टुटमोज प्रथम सही मायनों में राजशाही खानदान के नहीं थे। इसकी वजह से हातशेपसत को थोड़ी सामाजिक स्वीकार्यता मिली, जिसका फायदा उठाकर उसने अपने पति के निधन के बाद सत्ता पर कब्जा कर लिया। हालांकि टुटमोज प्रथम ने अपने सौतेले बेटे को गद्दी सौंपी थी लेकिन वह कभी सत्ता में रह नहीं पाया। पूरा इतिहास कुछ इस तरह गडमड था कि हातशेपसत की मौजूदगी और बेहतरीन सत्ता संचालन के बावजूद उसे स्थापित करने के ठोस प्रमाण नहीं मिल रहे थे। कुछ अमेरिकी और मिस्री विद्वानों को अचानक एक दिन एक खुली कब्र मिली, जिसके बाहर एक ममी पड़ी थी। यह अनुमान लगाना किसी के लिए भी असंभव होता कि मिस्र के शासक रह चुके किसी व्यक्ति के साथ इस तरह का व्यवहार हो सकता है कि उसकी ममी खुले में पड़ी हो। यह बात सौ साल पुरानी है। करीब 75 साल पहले एक और मिस्री विद्वान को उस ममी के पास सोने के गहने मिले। इससे उसे संदेह हुआ कि यह ममी किसी साधारण व्यक्ति की नहीं हो सकती। पूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया के बावजूद ममी का काफी हिस्सा नष्ट हो गया था और ले-देकर एक दांत सही सलामत मिला। उसी दांत के सहारे हातशेपसत की पहचान हुई और फिर उस ममी को सम्मानपूर्वक स्थापित किया गया। हातशेपस का शासन दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। पहले हिस्से में करीब छह वर्ष तक वह टुटमोज द्वितीय के बेटे के उत्तराधिकारी के रूप में शासन करती रही। सारे फैसले उसके होते थे लेकिन नाम उस नाबालिग बच्चे का रहता था। छह साल बाद हातशेपसत ने नाबालिग टुटमोज तृतीय को बेदखल कर दिया और खुद सत्ता संभाल ली। इसके बावजूद महिला के रूप में समाज के सामने जाने का साहस हातशेपसत नहीं जुटा सकी और हमेशा पुरुषों के कपड़े पहनती रही। इतना ही नहीं, उस समय की तमाम प्रतिमाओं में भी उसे पुरुष की तरह चित्रित किया गया। शक्तिशाली फरोहा होने के बावजूद समाज द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के डर की वजह से हातशेपसत में एक तरह का जटिल व्यक्तित्व विकसित हुआ। उसे यह डर हमेशा लगा रहता था कि ताकतवर पुरुष प्रधान मिस्री समाज उसे खारिज कर देगा। उसका योगदान भुला देगा और उसका अस्तित्व इतिहास से मिटा दिया जाएगा। साढ़े तीन हजार साल पुरानी इस इतिहास-कथा ने हातशेपसत के इसी डर और चिंता के कारण एक नया मोड़ लिया। उसने तय कर लिया कि आगे का पूरा शासन वह एक पुरुष फरोहा की तरह चलाएगी और एक अभियान चलाकर समाज में अपनी छवि एक पुरुष की तरह स्थापित करेगी। उसकी बाद की प्रतिमाओं में उसके महिला होने के संकेत तक नहीं मिलते बल्कि चेहरे पर दाढ़ी भी दिखती है। ऐसे कई दस्तावेज मिलते हैं, जिसमें हातशेपसत ने कहा कि वह शासन करने के लिए भेजी गई ईश्वरीय देन है। इसी दौरान उसने यह फैसला लिया कि पूरे साम्राज्य में उसकी विराट प्रतिमाएं लगाई जाएंगी, ताकि किसी को उसके फरोहा होने पर संदेह न रह जाए। मिस्र के छोटे से छोटे इलाके तक संदेश भेजे गए कि हातशेपस बादशाह है और कोई उसे चुनौती देने की कोशिश न करे। इसी के साथ उसने एक शब्द गढ़ा, जिसे रेख्त कहते थे और इसका अर्थ था-आम लोग। मिस्र की जनता को हातशेपसत प्राय: मेरे रेख्त कहती थी और हर फैसला यह कहकर करती थी कि रेख्त की राय यही है। लोकप्रियता हासिल करने की सारी सीमाएं हातशेपसत ने तोड़ दीं। हातशेपसत ने लगभग बीस साल के अपने शासन के दौरान हमेशा यह ख्याल रखा कि उसके किसी फैसले पर नील नदी के दोनों ओर बसे रेख्त की राय क्या होगी। एक दस्तावेज में उसने यहां तक लिखा कि अगर रेख्त की मर्जी नहीं होगी तो मेरा दिल धड़कना बंद कर देगा। हातशेपसत की मृत्यु 1458 ईसा पूर्व में हुई, जिसके बाद उसके सौतेले बेटे टुटमोज तृतीय ने उन्नीसवें फरोहा के रूप में सत्ता संभाली। अपनी सौतेली मां की तरह टुटमोज तृतीय को भी स्मारक बनाने का शौक था। मुर्गी को भोजन की तरह इस्तेमाल करने की परंपरा उसी ने शुरू की और उन्नीस साल के शासन में सत्रह सैनिक अभियान चलाए और कामयाब रहा। अपने शासनकाल के अंतिम दौर में उसने अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट होकर आराम से रहने की जगह एक अजीबोगरीब फैसला किया। यह फैसला था-अपनी सौतेली मां हातशेपसत द्वारा निर्मित सारे स्मारक और उसकी सारी प्रतिमाएं नष्ट कर देने का ताकि इतिहास में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाए। टुटमोज तृतीय अपने इस अभियान में भी सफल रहा और अपनी सौतेली मां को उसने साढ़े तीन हजार साल के लिए इतिहास से गायब कर दिया। इतना ही नहीं, उसने अपनी सौतेली मां की ममी को भी फरोहा के शाही मैदान से हटा दिया। उसे एक ऐसी जगह ले जाकर रखा, जहां किसी को संदेह ही न हो कि वह हातशेपसत हो सकती है। निश्चित तौर पर अमरत्व की कामना, इतिहास में खो जाने के डर और समाज में अपनी स्वीकार्यता थोपने की कोशिश में किए गए प्रयास कभी पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकते। लेकिन साथ ही यह भी लगता है कि इतिहास को नष्ट करने या उसे मिटा देने की कोशिश भी उतनी ही नाकामयाब होती है।

Sunday, August 2, 2009

गंगा जसी पवित्र गायकी


यह एक अद्भुत संयोग है कि कर्नाटक और हिंदुस्तानी दोनों तरह की संगीत धाराओं का गढ़ कर्नाटक में ही है। अंतर सिर्फ इतना है कि हिंदुस्तानी संगीत कर्नाटक को बीच से काटने वाली तुंगभद्र नदी के उत्तर में पनपा और बढ़ा जबकि कर्नाटक संगीत नदी के दक्षिण में। हिंदुस्तानी संगीत की गायकी के लगभग सारे बड़े नाम उत्तरी कर्नाटक में एक-दूसरे से सटे तीन जिलों से आते हैं, जिनमें धारवाड़, हुबली और बेलगांव शामिल हैं। सवाई गंधर्व, कुमार गंधर्व, बसवराज राजगुरु, मल्लिकार्जुन मंसूर, भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल और राजशेखर राजगुरु सब के सब इसी धरती की देन हैं। गंगूबाई अपने परिवार में पहली गायिका नहीं थीं लेकिन उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि शास्त्रीय गायकी के लिए बहुत अनुकूल नहीं थी। यह बात भी उनके खिलाफ जाती थी कि वे महिला होकर शास्त्रीय संगीत की पुरुष प्रधान बिरादरी में दाखिल होना चाहती थीं। गंगूबाई की मां अंबाबाई, यहां तक कि उनकी दादी भी देवदासी परंपरा से आती थीं और मंदिरों में गायन उनके लिए सहज-सामान्य था लेकिन मंदिर के बाहर सार्वजनिक मंच से शास्त्रीय गायन उतना ही कठिन। गंगूबाई का गायन आठ दशक में फैला हुआ है लेकिन शायद गायकी की पुख्तगी से ज्यादा बड़ी बात यह है कि उन्होंने तमाम तरह की विषमताएं ङोलते हुए अपना मुकाम हासिल किया। कन्नड़ में लिखी अपनी आत्मकथा मेरा जीवन संगीत में गंगूबाई ने इसका विस्तार से हवाला दिया है और लिखा है कि उन्हें ऊंची जातियों के शुक्रवार पेठ मोहल्ले से निकलते हुए किस तरह की फब्तियां सुननी पड़ती थीं। उन्हें बाई और कोठेवाली कहा जाता था। गंगूबाई के बचपन के गांव हंगल में मैंने उनका पुश्तैनी घर देखा। सौ साल पहले बने छोटे से अहाते वाले उस घर के पांच टुकड़े हो गए थे, जिस पर बंटवारे के बाद परिवार के लोगों ने अलग-अलग घर बना लिए थे। गंगूबाई की मां के हिस्से में आया टुकड़ा उजाड़ था। खपरैल की छत थी, पर टूटी हुई। सामने के दरवाजे पर ताला लगा था और लकड़ी की दोनों खिड़कियां गायब थीं। मुझे उस घर तक ले गई एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि गंगू उनकी बचपन की सहेली थी लेकिन अब यहां नहीं आतीं। उसने हुबली में घर बनवा लिया है। नई पीढ़ी के बच्चों में ज्यादातर ने उनका नाम नहीं सुना था और कुछ बुजुर्गो में वही हिकारत थी, जिसका जिक्र विषमताओं के रूप में गंगूबाई ने अपनी किताब में किया है। हुबली में गंगूबाई का छोटा सा घर है। सामने बरामदा, अंदर एक आंगन और उसके तीन तरफ बने कमरे। मैंने हंगल और उनके बचपन के बारे में पूछा तो गंगूबाई टाल गईं। बाद में उनकी बेटी और बहू, जो खुद बेहतरीन गायिका हैं, कहा कि बचपन में सामाजिक अपमान का असर मां पर इतना था कि उन्होंने पचपन साल की होने तक बेटी को सार्वजनिक मंच से गाने नहीं दिया। उन्हें वह वाकया कभी नहीं भूला, जब गायन के दौरान श्रोताओं में से किसी ने कहा, ‘गाना बहुत हुआ बाई, अब ठुमका हो जाए।गंगूबाई ने अपनी आत्मकथा में बहुत संयम से लेकिन पीड़ा के साथ लिखा है कि शास्त्रीय संगीत में आज भी महिलाओं और पुरुषों में भेदभाव होता है। शायद यही वजह है कि बड़ी से बड़ी गायिका बाई होकर रह जाती है जबकि पुरुष उस्ताद और पंडित बन जाते हैं। इस आधार पर कि वे मुसलमान हैं या हिंदू। उन्होंने इस सिलसिले में हीराबाई और केसरबाई का जिक्र किया है। इस बात पर हैरानी होती है कि शास्त्रीय संगीत में महिलाएं ऊंचे घरानों से क्यों नहीं आईं और जहां से आईं, उनकी स्वीकार्यता इतनी आसान क्यों नहीं थी। इसमें हीराबाई बारोडकर, केसरबाई केरकर, जद्दनबाई, रसूलनबाई और अख्तरीबाई के नाम उल्लेखनीय हैं। समाज ने बहुत बाद में केवल अख्तरीबाई को थोड़ी इज्जत बख्शी और उन्हें बेगम अख्तर कहा जाने लगा। गंगूबाई का संबंध किराना घराने से था, जिसके उस्ताद अमीर खां मीरज में रहते थे। गंगूबाई की मां अंबाबाई जब अपने घर में गाती थीं तो उस्ताद अब्दुल करीम खां उन्हें सुनने आते थे। गंगूबाई के गुरु सवाई गंधर्व और हीराबाई भी अंबाबाई की गायकी के प्रशंसकों में थीं। धारवाड़ में अंबाबाई को सुनने के लिए उनके घर के बाहर भीड़ जमा हो जाती थी। अंबाबाई ने अपनी बेटी को संगीत की तालीम देने की जिम्मेदारी सवाई गंधर्व को सौंप दी, जिसके लिए गंगूबाई को 30 मील दूर जाना पड़ता था। वहां उनके गुरुबंधु थे पंडित भीमसेन जोशी। उस जमाने में दिन में सिर्फ दो बार रेल चलती थी जो धारवाड़ को सवाई गंधर्व के गांव से जोड़ती थी। यानी कि गाड़ी छूट जाए तो रात स्टेशन पर ही बितानी पड़ती। भीमसेन जोशी वापसी में अक्सर गंगूबाई को घर तक छोड़ने आते थे। फिरोज दस्तूर भी उन दिनों वहीं थे। सवाई गंधर्व ने गंगूबाई को सिखाने में ख्याल पर जोर दिया और चाहा कि वह सात रागों पर महारत हासिल करें। जाहिर है, गंगूबाई के पास गायकी में भीमसेन जोशी जसी विविधता नहीं है लेकिन भैरवी, आसावरी, भीमपलासी, केदार, पूरिया धनाश्री और चंद्रकौंस में विलंबित में जिस तरह का राग विस्तार उनके पास है वह जोशी और दस्तूर के पास भी नहीं। अपनी हर रचना को प्रार्थना कहने वाली गंगूबाई की सिर्फ एक ख्वाहिश अधूरी रह गई कि वह सौ साल जीना चाहती थीं। प्रकृति ने उन्हें तीन और वर्ष नहीं दिए लेकिन उनकी अंदर तक धो देने वाली गंगाजल जसी पवित्र गायकी किसी की कृपा की मोहताज नहीं है। वह सैकड़ों साल जिंदा रहेगी।

Monday, May 11, 2009

कालजयी गायकी का पांचवां स्तंभ

इकबाल बानो ने पचास हजार लोगों के सामने फैज की नज्म ‘हम देखेंगेज् गाई और गाना खत्म होने तक यह वाकया एक आंदोलन में बदल गया।

पक्के गाने छोड़ दिए जाएं तो दक्षिण एशिया में कालजयी गायकी के पांच स्तंभ नजर आते हैं। वह गायकी जो अपनी पीढ़ी में तो मिसाल थी ही, आज भी है और सदियों तक रहेगी। इस गायकी में सिर्फ अदायगी, तमीज, तहजीब और तलफ्फुज नहीं है बल्कि कुछ ऐसा भी है, जो सीधे नब्ज पर हाथ रखता है और अंदर तक झकझोर देता है। इसने अपने मेयार खुद तय किए हैं। चाहे वह इश्क हो, कि फलसफा या फिर प्रतिरोध और जिंदगी की शर्ते। इकबाल बानो इन पांच स्तंभों में से एक थीं, जो अब हमारे बीच नहीं हैं।कालजयी गायकी के शिखर पर जिन पांच गायकों और उनके पसंदीदा कलाम को रखा जाएगा, उनके बीच बराबरी का रिश्ता है। मेरी नजर में नूरजहां का ‘मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग, मेहदी हसन का ‘रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ, नुसरत फतेह अली खान का ‘तुम एक गोरखधंधा हो, बेगम अख्तर का, ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे और इकबाल बानो का ‘हम देखेंगें लाजिम है कि हम भी देखेंगे इस गायकी के शिखर पर हमेशा रहेंगे। इकबाल बानो के गुजर जाने के बाद इन पांच स्तंभों में से चार अब दुनिया में नहीं हैं। मेंहदी हसन हयात हैं पर अस्पताल में हैं और उनकी हालत ठीक नहीं है। मोहतरमा इकबाल बानो दिल्ली की थीं। बचपन यहीं गुजरा। आठ साल की उम्र में उनके एक रिश्तेदार ने किसी तरह उनके पिता को राजी किया कि वह बानो को संगीत सीखने दें क्योंकि ‘उसकी आवाज में कशिश और एक बेहद अलग ढंग की रूमानियत है। मोहतरमा ने उस्ताद चांद खां से तालीम पाई, जो दिल्ली घराने के माहिर गायक थे। चांद खां की सिफारिश पर इकबाल बानो ने अपनी पहली ठुमरी ऑल इंडिया रेडियो में रिकार्ड कराई। तेरह साल की उम्र में पहला सार्वजनिक कार्यक्रम पेश किया और पचास के दशक में वह एक जानी-मानी शख्सियत बन चुकी थीं। हालांकि इसी बीच 1952 में उनकी शादी हुई और वह पाकिस्तान चली गईं। इकबाल बानो के शौहर ने उन्हें गाने से नहीं रोका और इसी दौरान वह पाकिस्तानी फिल्मों की सबसे बड़ी पाश्र्वगायिका बन गईं। ‘गुमनाम, ‘कातिल, ‘सरफरोश और ‘नागिन के उनके गीत आज भी लोकप्रिय हैं।अपने शौहर के इंतकाल के बाद इकबाल बानो लाहौर चली गईं और अंतिम दिनों में वहीं रहीं। लाहौर से उनका रिश्ता अलग तरह का था। यह वही शहर था, जिसने इकबाल बानो को पाकिस्तान में प्रतिरोध की सबसे मुखर आवाज बना दिया। यह बात 1985 की है। पाकिस्तान में जनरल जिया उल हक का फौजी शासन था और तमाम कलाकारों पर प्रतिबंध लगा हुआ था। फैज अहमद फैज जेल में थे और उनकी शायरी गाने पर रोक थी। इकबाल बानो ने पचास हजार लोगों के सामने फैज की नज्म ‘हम देखेंगे, लाजिम हम देखेंगे गाई और गाना खत्म होने तक यह वाकया एक आंदोलन में बदल गया। नारे लगने लगे। उस नज्म की कुछ पंक्तियां थीं : ‘जब अर्जे खुदा के काबे से/सब बुत उठवाए जाएंगे/हम अहले सफा मरदूदे हरम/मसनद पर बिठाए जाएंगे/सब ताज उछाले जाएंगे/सब तख्त गिराए जाएंगे/हम देखेंगे/लाजिम है कि हम भी देखेंगे।फैज की एक और नज्म को इकबाल बानो ने अपनी आवाज से लोगों के दिलों में उतार दिया। ‘आइए हाथ उठाएं हम भी/हम जिन्हें रस्में दुआ याद नहीं/हम जिन्हें सोजे मुहब्बत के सिवा/कोई बुत/कोई खुदा याद नहीं। उनकी गायकी में बाकी सिद्दीकी की गजल ‘दागे दिल हमको याद आने लगे ने एक नई ऊंचाई अदा की। मोहतरमा की शिक्षा मूलत: गजल, ठुमरी और दादरा में थी और नज्मों की अदायगी में उन्हें इसका पूरा फायदा मिला। अपनी चौहत्तर साल की जिंदगी में साठ साल गायकी को समर्पित करने वाली इकबाल बानो को अपने कद और लोकप्रियता का अंदाजा था, पर उन्होंने समाज के साथ रिश्ते के बीच इसे कभी आड़े नहीं आने दिया।इकबाल बानो की लोकप्रियता केवल उर्दूभाषी हिंदुस्तान और पाकिस्तान तक सीमित नहीं थी। फारसी पर उनकी गहरी पकड़ और फारसी संगीत की समझ की वजह से वह ईरान, मध्यपूर्व के देशों तथा अफगानिस्तान में खासी चर्चित थीं। फारसी में ‘हाफिज और ‘बेदिल की शायरी में उनकी आवाज ने जादुई असर पैदा कर दिया। बेहतरीन अदायगी और समाज के साथ अपने सरोकारों के चलते मोहतरमा इकबाल बानो उस मुकाम पर पहुंच गईं, जिसकी वह सचमुच हकदार थीं। जिसने इकबाल बानो को नहीं सुना, उसने पूरी एक पीढ़ी की आवाज नहीं सुनी। उस आवाज को हमारा सलाम।

Monday, March 30, 2009

कांग्रेस की कवायद

ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी ने जानबूझकर अपनी मुश्किलें बढ़ाने का फैसला कर लिया है। हालांकि पार्टी के कुछ नेता कहते हैं कि यह कांग्रेस की दूरगामी सोच का परिणाम है, क्योंकि वह अब से ज्यादा 2014 के बारे में सोच रही है। इस तर्क को पचा पाना आसान नहीं लगता, लेकिन जिस तरह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन बिखर रहा है, इसे देखना कठिन नहीं है। कांग्रेस ने 29 जनवरी को अपनी कार्य समिति की बैठक में यह फैसला कर लिया था कि वह राष्ट्रीय स्तर पर एकला चलो रे के सिद्धांत पर चुनाव लड़ेगी और अन्य राजनीतिक दलों के साथ राज्य स्तर पर सीमित समझौते किए जाएंगे।इसी निर्णय का परिणाम बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी की तीन सीट लेने की शर्त न मानने के रूप में हुआ और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ उसकी मैराथन वार्ता टूट गई। तमिलनाडु में पीएमके के अलग हो जाने से कांग्रेस की हालत खराब ही होगी। एक तरह से देखा जाए, तो 543 सदस्यों की लोकसभा में कांग्रेस केवल 383 सीट पर चुनाव लड़ रही है। उत्तर प्रदेश की 80, बिहार की 40 और तमिलनाडु तथा पुड्डुचेरी की एक सीट मिलाकर कुल 40 सीट पर उसके लिए चुनाव लड़ना, न लड़ना बराबर ही होगा। यह संख्या 160 बनती है, जहां से कांग्रेस पार्टी को बमुश्किल 10 सीट मिल सकती हैं। यह जरूर है कि कांग्रेस इन सभी सीटों पर प्रत्याशी खड़ा करेगी, लेकिन उम्मीद का दामन उम्मीदवार के हाथ शायद ही आए।कांग्रेस ने सभी 543 सीट पर एक सर्वेक्षण कराया है और पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक उसे अपने तौर पर 150 सीट मिल सकती है। पार्टी को उम्मीद है कि यह आंकड़ा उसे पंद्रहवीं लोकसभा में सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनाने के लिए पर्याप्त होगा, क्योंकि बाकी दलों की स्थिति इससे खराब रहने वाली है। निश्चित रूप से 150 सीट का यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश, बिहार और तमिलनाडु में उसे अपनी सही स्थिति का अंदाजा कराता है। हालांकि वहां तक पहुंचना भी आसान नहीं है। पार्टी के सर्वेक्षण में उसे सबसे ज्यादा फायदा पश्चिम बंगाल, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उड़ीसा से मिलता दिखाया गया है।दरअसल 29 जनवरी की कार्य समिति की बैठक के बाद संप्रग का बिखराव अचानक बहुत तेज हो गया। जनवरी के अंत तक चट्टान की तरह संप्रग के साथ खड़ा रहने का दावा करने वाले उसके कई सहयोगी दलों में वह प्रतिबद्धता हल्की पड़ने लगी और दो महीने में पांच साल तक सरकार चलाने वाला वह संप्रग टुकड़े-टुकड़े हो गया, जिसे 2004 में संप्रग और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ईंट-ईंट जोड़कर खड़ा किया था। संप्रग को बचाने या उसमें नए दलों को जोड़ने में सोनिया गांधी की तत्परता भी इस बार नजर नहीं आ रही।जनवरी के अंत के संप्रग की तस्वीर मार्च के अंत तक इतनी बदल गई कि उसकी पहचान भी मुश्किल हो गई। कुछ छोटे दलों और समूहों को छोड़ दिया जाए, तो संप्रग से किनारा करने वाले दलों की संख्या उसके साथ टिके रहने वाली पार्टियों से चार गुना ज्यादा है। यह केवल उत्तर या दक्षिण तक सीमित नहीं है, इसका असर चौतरफा हुआ है। संप्रग से हटने या चुनावी जंग में किनाराकशी करने वाले दलों में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी, पीडीपी, एमडीएमके, पीएमके और तेलंगाना राष्ट्र समिति शामिल है। निश्चित तौर पर कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना होगा। उसके साथ बचे दलों में मुख्य रूप से केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और डीएमके का नाम लिया जा सकता है।सवाल यह उठता है कि आखिर 29 जनवरी की कार्य समिति की बैठक में संप्रग के बिखराव की आशंका व्यक्त किए जाने के बावजूद पार्टी ने सहयोगी दलों को नाराज करने की हद तक जाकर ऐसा फैसला क्यों किया कि वह अधिकतर सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करेगी। इस निर्णय में 2009 के चुनाव की तात्कालिकता नहीं थी, लेकिन पार्टी ने इसे भविष्य के बारे में सोचते हुए कड़वी दवा की तरह पीने का फैसला किया।कार्य समिति में यह बात भी सामने आई कि कांग्रेस को बचाए रखने के लिए जरूरत होने पर पार्टी को अन्य विकल्पों के साथ विपक्ष में बैठने के लिए तैयार रहना चाहिए। पार्टी ने इसे पराजय की मानसिकता की जगह भविष्य दृष्टि के रूप में देखने की दलील दी। इससे तो यही लगता है कि उसकी नजर 2009 पर नहीं, बल्कि उसके आगे है। लालू यादव ने इस संबंध में टिप्पणी की थी कि पार्टी 2009 का चुनाव नहीं लड़ रही, 2014 की तैयारी कर रही है।एक तरह से देखा जाए, तो शायद गठबंधनों के साथ चुनाव लड़ने और क्षेत्रीय दलों की इनायत पर तीन या पांच सीट लेने पर अगले चुनाव तक कांग्रेस का कम से कम उत्तर भारत से पूरी तरह सफाया हो जाता। पार्टी ने संभवत: इसीलिए जीत से ज्यादा महत्व मौजूदगी को दिया। आजाद भारत के 60 में से लगभग 50 वर्ष सत्ता में रहने वाली कांग्रेस पार्टी के लिए यह फैसला आसान नहीं रहा होगा। लेकिन सच्चाई यही है कि अगर कांग्रेस ने यह निर्णय न किया होता, तो बतौर राष्ट्रीय पार्टी, यह उसका आखिरी चुनाव होता।

Saturday, February 28, 2009

स्लमडॉग पर गिद्धभोज


गिद्ध मानसिकता के नमूने हर जगह देखे जा सकते हैं, खासकर सबसे आगे रहने की होड़ में या इस बात में कि जो कुछ हुआ है, उसका श्रेय कैसे लिया जाए।



मेरे एक उम्रदराज मित्र हैं। मनुष्य की मानसिकता को पशु-पक्षियों की प्रवृत्ति और उनके नैसर्गिक गुणों से जोड़कर देखने की प्राचीन परंपरा के इस समय संभवत: एकमात्र वाहक। लोमड़ी की तरह चालाक, कुत्ते जैसा वफादार, हाथी की तरह मस्त या सांप जैसा जहरीला कह देना उन्हें काफी नहीं लगता। वे भाषाविद हैं और शब्दों के निरंतर अर्थ-विस्तार में उनकी गहरी रुचि है। अपने पुत्र के विवाह के मौके पर उन्होंने निमंत्रण पत्र छपवाया तो कई लोग नाराज हो गए। निमंत्रित होने के बावजूद उन्हें ऐसे समारोह में जाना मंजूर नहीं था, जहां उन्हें गिद्ध कहा जाए। निमंत्रण पत्र में, जहां आमतौर पर प्रतिभोज लिखा होता है, उन्होंने गिद्धभोज छपवा दिया था। उनका तर्क था कि यह बुफे भोजन का निकटतम सही शब्द है क्योंकि लोग अचानक अपनी प्लेट लिए खाने पर टूट पड़ते हैं। उस समय उनका व्यवहार शव पर मंडराते गिद्ध के ज्यादा और बेहद करीब होता है।गिद्ध इस समय खतरे में हैं। उनकी संख्या लगातार घट रही है और पूरी प्रजाति विलुप्त होने के कगार पर है। वे गांवों में अब कम ही दिखते हैं और शहरों से उनका लगभग सफाया हो गया है। पर गिद्धों को चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि मानसिकता के रूप में आज उनकी उपस्थिति पहले से कहीं ज्यादा बड़ी संख्या में है। और यह सिर्फ भोजन तक सीमित नहीं है। इस गिद्ध मानसिकता के नमूने हर जगह आसानी से देखे जा सकते हैं। खासकर, सबसे आगे रहने की होड़ में। या इस बात में कि जो भी हुआ है, उसका श्रेय कैसे लिया जाए। उन्हें पता है कि वे चूके तो गिद्ध मानसिकता वालों का दूसरा जत्था आगे आ जाएगा और उनके हिस्से एक लोथड़ा भी नहीं आएगा। यह वही मानसिकता है, जिसके तहत विभिन्न राजनीतिक दल महात्मा गांधी से लेकर स्वामी विवेकानंद तक किसी को भी अपना बनाने और हड़पने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। यानी जो भी अपने फायदे में दिखे, अपना लो। लॉस एंजेलीस में सिनेमा का सबसे बड़ा पुरस्कार समारोह खत्म होने के कुछ ही घंटे के भीतर यही गिद्धभोज फिर दिखाई पड़ा। बात सिर्फ बधाई देने तक होती तो किसी को आपत्ति नहीं होती। मुंबई की झुग्गी बस्ती पर बनी एक ब्रिटिश फिल्म ने आठ आस्कर जीते तो कांग्रेस पार्टी उनका श्रेय लेने में सबसे आगे निकल गई। उसने कहा कि ‘स्लमडॉग मिलियनेयर को ऑस्कर पुरस्कार संप्रग सरकार द्वारा बनाए गए माहौल की वजह से मिला। पार्टी प्रवक्ता ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह माहौल स्लम के कारण बना या डॉग के कारण। या फिर आर्थिक उदारीकरण की नीति की वजह से बने मिलियनेयर से। आम चुनाव करीब आ रहे हैं तो भी ऐसा बेहूदा दावा समझ से परे है। फिल्म में सरकार की रत्ती भर भी भूमिका रही होती तो बात समझ में आती लेकिन हर अच्छी चीज का श्रेय लेने की यह हड़बड़ी कतई गले से नहीं उतरती बल्कि इससे उबकाई आती है। इस हास्यास्पद दावे को थोड़ा और कीब से देखिए। स्लमडॉग मिलियनेयर एक अच्छी किताब पर बनी निहायत साधारण फिल्म है, जिसका भारत से केवल इतना संबंध है कि कहानी भारतीय है और उसके अधिकतर पात्र भारत के हैं। फिल्म अमेरिकी पैसे से बनी उसका निर्देशन एक और ब्रितानी फिल्मकार ने किया। यानी कि वह भारतीय सिनेमा का प्रतिनिधित्व नहीं करती। स्लमडॉग के पहले यही स्थिति एक बार पहले भी आ चुकी है, जब रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी को आठ ऑस्कर मिले थे। उसमें भी कहानी, उसके मुख्यपात्र और पृष्ठभूमि को छोड़कर कुछ भी भारतीय नहीं था। संयोग से गांधी का श्रेय लेने की ऐसी कोशिश नहीं हुई, जैसी स्लमडॉग के मामले में दिखाई पड़ी।अगर स्लमडॉग को भारतीय फिल्म कहने का तर्क यही है कि इस फिल्म की पूरी शूटिंग भारत में हुई तो इस नजरिए से भारत की तमाम फिल्में अमेरिकी, ब्रिटिश या स्विस हो जाएंगी क्योंकि उनकी पूरी शूटिंग वहां हुई। इनमें से कोई देश ऐसा दावा नहीं करता। दरअसल स्लमडॉग का श्रेय लेने का प्रयास गिद्ध मानसिकता के अलावा पश्चिम की मानसिक गुलामी भी है। अगर पश्चिमी देश किसी चीज को मान्यता देते हुए उसे स्वीकार कर लें तो यह भारत के लिए एक उपलब्धि हो जाता है। विश्व की महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले देश के लिए पश्चिमी मान्यता की भीख की गरज से कटोरा लेकर खड़े होना निंदनीय तो है ही, शर्मनाक भी है और इसका श्रेय लेना पूरी तरह घृणित और अस्वीकार्य। स्लमडॉग पर सिनेमा जगत की प्रतिक्रिया भी अनुचित है पर उसे कुछ हद तक यह मानकर छोड़ा जा सकता है कि वे सपनों के व्यापारी हैं और शुद्ध व्यापार की गरज से ऐसा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे भारतीय सिनेमा के लिए हॉलीवुड के दरवाजे खुल जाएंगे। उनकी कमाई बढ़ जाएगी और पहचान भी। राष्ट्रीय सोच के स्तर पर इस स्वार्थ का कोई अर्थ नहीं है। राजनीतिक दलों में इस तरह की होड़ अशोभनीय है। कांग्रेस इस मामले में चुप रहकर या केवल एआर रहमान को बधाई देकर शायद बच जाती पर उसने ऑस्कर को परमाणु करार से जोड़कर स्वयं को हंसी का पात्र बना लिया है। रचनात्मकता और राजनीति दो अलग-अलग धाराएं हैं, जिन्हें अलग ही रहने दिया जाना चाहिए। सिवाय कुछ उन सहायक नदियों के, जो कभी इधर तो कभी उधर मिला करती हैं।

Wednesday, February 18, 2009

तुमने मेरी जिंदगी का खालीपन खुशियों से भर दिया

प्रेम कथा-5

एडविना अपने प्रेम संबंधों को लेकर बहुत खुली हुई थीं और उन्हें गोपनीय रखने की अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं करती थीं। लेकिन उनका यह व्यवहार अपने पति डिकी माउंटबेटन के मामले में बिलकुल भिन्न था। एडविना को यह कतई मंजूर नहीं था कि कोई दूसरी महिला डिकी की जिंदगी में आए। डिकी ने अपनी पुरानी मित्र योला को दिल्ली आमंत्रित किया तो ऊपरी तौर पर दोस्ताना अंदाज निभाते हुए एडविना ने पूरी कोशिश की कि योला जल्दी से जल्दी लंदन लौट जाए। उन्होंने एक यात्रा निर्धारित की और योला को लेकर घूमने चली गईं ताकि वह माउंटबेटन के साथ न रह पाएं। इतना ही नहीं, एडविना ने डिकी से हामी भरवाई कि उनके निधन के बाद भी वह योला से शादी नहीं करेंगे। एडविना के प्रेम संबंधों की सूची बहुत लंबी है, जिनमें से एक उस दौरान दिल्ली में थे। फील्ड मार्शल क्लॉड ऑकिनलेक। लेकिन नेहरू इन सब से भिन्न थे और पहली मुलाकात के बाद से वह लगातार एडविना की जिंदगी में महत्वपूर्ण बने रहे। अपने कार्यालय में बैठे नेहरू को एक दिन एडविना की चिट्ठी मिली। वर्ष 1957 में एडविना ने लिखा, ‘‘दस साल.. दस साल हो गए। यह दस साल कितने महत्वपूर्ण हैं। इतिहास के लिए और हमारी निजी जिंदगियों के लिए। नेहरू ने जवाब लिखा, ‘‘सचमुच.. दस साल। नेहरू और एडविना की संभवत: आखिरी मुलाकात 1960 में हुई। तब नेहरू सत्तर साल के थे और एडविना अट्ठावन की। 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस की परेड में दोनों अगल-बगल खड़े थे। शाम को राष्ट्रपति भवन में चाय पर उनकी फिर मुलाकात हुई। एडविना की तबीयत ठीक नहीं रहती थी लेकिन नेहरू के साथ की वजह से उनका चेहरा दमकने लगता था। मैरी सेटन कहती हैं, ‘‘साथ-साथ खड़े नेहरू और एडविना कितने युवा लगते हैं।एडविना डिकी माउंटबेटन को अपना ‘पोस्टर ब्वॉय और नेहरू को ‘प्रेरणा कहा करती थीं। माउंटबेटन और नेहरू के बीच बातचीत और खतो-किताबत का दो-तिहाई हिस्सा एडविना के बारे में होता था। डिकी ने लिखा, ‘‘एडविना की तबीयत ठीक नहीं है और तुम्हें भी आराम की जरूरत है। कुछ दिन के लिए लंदन आ जाओ। एडविना तुम्हारा इंतजार कर रही हैं। नेहरू ने एक चिट्ठी एडविना को लिखी और एक डिकी को। उन्होंने डिकी को लिखा, ‘‘बहुत काम है और वक्त बहुत कम। लेकिन मैं आऊंगा। जब नेहरू लंदन में होते थे तो माउंटबेटन दूसरे घर में चले जाते थे ताकि एडविना और नेहरू कुछ समय साथ गुजार सकें। एडविना का दिल्ली और नेहरू का लंदन आना-जाना इतना विवादास्पद हो गया था कि ब्रिटेन की महारानी को इस मामले में खुद हस्तक्षेप करना पड़ा। किसी भी प्रेम कथा की तरह एडविना और नेहरू की प्रेम कहानी में बहुत कुछ अनकहा, अनसुना, अनलिखा रह गया। नेहरू को इसका मलाल था, ‘‘इतना कुछ कहना चाहता हूं पर शब्द साथ नहीं देते। एडविना ने लिखा, ‘‘तुमने मेरी जिंदगी का खालीपन खुशियों से भर दिया। उम्मीद है कि तुम्हारी जिंदगी में मेरा दखल भी इसी तरह का होगा।समाप्त