Saturday, January 30, 2010

ऐसे भी बनती हैं कलाकृतियां

ऐसे भी बनती हैं कलाकृतियां। कई बार। अचानक और अनचाहे। जहां उम्मीद न हो। ऐसी जगह। बन जाता है कैनवस। खुला मैदान। रंग-बिरंगे धुएं के गुबार में। जैसे एक बेतहाशा बड़ी पेंटिंग। कुछ संगीनें उसमें। एक टैंक। और नुक्ता सा तिरंगा। ऊपर। पेड़ों के बीच में। लहराते हुए झांककर देखता। अपने बच्चों को। एनसीसी के कैडेट। मजबूत इरादों के साथ। अंजाम देते। पूरी लगन, तैयारी और प्रशिक्षण के साथ। उठाते कला के स्तर तक। युद्धाभ्यास को। वे कहीं भी पैदा कर देंगे कला। आश्वस्त करते। कि वे हैं। रंग भरने के लिए।

Thursday, January 28, 2010

पत्रकारिता के महागुरु राबर्ट नाइट


भारतीय अंग्रेजी पत्रकारिता को समझने के लिए और तथ्य सामने लाने की जरूरत है और यह काम उसके महागुरुओं को जाने बिना संभव नहीं है। एडविन हर्शमान ने राबर्ट नाइट पर पहली किताब लिखी है। यह काफी नहीं है।

मधुकर उपाध्याय

भारतीय पत्रकारिता आज जिस मुकाम पर है, उसमें अक्सर पीछे पलटकर देखना जिसे लगभग गैरजरूरी-सा हो गया है। इसमें पीछे छूट जाने का खतरा निहित है, हालांकि यह पूरा सच नहीं है। संचार टेक्नोलॉजी का विस्फोट शायद इसकी बड़ी वजह है, जिसने मीडिया के हर क्षेत्र को पंख लगा दिए हैं और ऐसे दरीचे खोल दिए हैं कि समूचा आसमान उसे अपनी मुट्ठी में लगता है। कोई यह मौका चूकना नहीं चाहता और जाहिर है, इस भागमभाग में अतीत को बिना मतलब का बोझ समझने लगता है। इस दौर में एक और बदलाव आया है- पत्रकारिता के आधुनिक महागुरुओं का। उन महारथियों का, जो संचार माध्यमों को साबुन और टूथब्रश की तरह का उत्पादन मानते हैं और उसके लिए बाजार तलाश करते घूमते हैं। निश्चित तौर पर पत्रकारिता उनके लिए व्यापार है, जिसमें घाटे का सौदा किसी को पसंद नहीं, भले इस प्रक्रिया और हड़बड़ी में अतीत के साथ वर्तमान की भी बलि चढ़ जाए।

इस आपाधापी में भी अतीत का एक पन्ना पलटना जरूरी लगता है। इस पन्ने पर पत्रकारिता के इतिहास की एक नहीं बल्कि दो महागाथाएं दर्ज हैं और दोनों के केंद्र में एक ही व्यक्ति है। यह पन्ना पढ़े बिना भारत में, खासकर अंग्रेजी पत्रकारिता का इतिहास पूरा नहीं होगा। इससे पत्रकारिता का एक नया अध्याय भी खुलता है। हालांकि उसका उद्देश्य जनपक्षधरता से अधिक ब्रितानी राज के लिए अधिकतम लाभ सुनिश्चित करना है। यह लगभग उसी तरह की दुधारी तलवार वाला तर्क है, जो अक्सर रेलगाड़ियां चलाने के सदंर्भ में आता है। यह कतई आश्चर्यजनक नहीं लगता, क्योंकि रेल पटरियां बिछाने और दैनिक अखबार शुरू करने का कालखंड करीब-करीब एक ही है।

अपने शुरुआती दिनों से लेकर लगभग पूरी बीसवीं सदी में लगातार महत्वपूर्ण बने रहे दो अखबार- द टाइम्स ऑफ इंडिया और द स्टेट्समैन एक ही व्यक्ति ने शुरू किए थे। रॉबर्ट नाइट को पत्रकारिता का कोई अनुभव नहीं था और वह पत्रकारिता करने भारत आए भी नहीं थे। लैम्बेथ में 1825 में जन्मे रॉबर्ट की स्कूली शिक्षा मामूली थी लेकिन उनकी सोच पर उपयोगितावाद के पुरोधा जेम्स मिल का भारी असर था। जेम्स, उनके सहयोगी जेरेमी बेंथम और दोनों के शिष्य रॉबर्ट को लगता था कि उनकी सभ्यता भारतीय लोगों से बेहतर है और यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे भारत को सभ्य बनाएं। इस प्रक्रिया में रॉबर्ट को ईस्ट इंडिया कंपनी के कुछ निर्णय ठीक नहीं लगते थे और वे उसकी आलोचना करने से नहीं चूकते थे।

रॉबर्ट भारत में नौकरी करने आए थे। उन्हें शराब आयात करने वाली एक कंपनी में बहीखाता संभालने वाले क्लर्क का काम मिला था। मेहनती रॉबर्ट नौकरी के बाद बचा समय लेख लिखने में लगाते और उन्हें नियमित रूप से बाम्बे गजट और बाम्बे टाइम्स को भेजा करते थे। उन साप्ताहिक अखबारों में रॉबर्ट नाइट जसा दूसरा कोई लेखक नहीं था। एक बार ‘बाम्बे टाइम्सज् के संपादक छुट्टी पर गए तो उन्होंने रॉबर्ट को अपनी अनुपस्थिति में अखबार के संपादन की जिम्मेदारी सौंप दी। शायद रॉबर्ट नाइट को इसी मौके का इंतजार था। संपादक लौटे तब भी रॉबर्ट वहीं बने रहे और जल्दी ही उसके साझीदार बन गए। अपने दोस्तों से पैसे जुटाए और 1861 में दैनिक के रूप में द टाइम्स ऑफ इंडिया की शुरुआत की। कुछ ही समय में वह शहर का सबसे बड़ा अखबार बन गया और उसकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी।

रॉबर्ट नाइट के लिखने का ढंग नहीं बदला था और उसे पूरी तरह न समझकर असहज होने वाले लोगों की कतार भी। रॉबर्ट अक्सर भारतीय लोगों का पक्ष लेते दिखाई देते। बंबई नगर निगम चुनाव में भारतीय लोगों के अधिक प्रतिनिधित्व की, उन्होंने जमकर हिमायत की। जब यह हुकूमत को नागवार गुजरने लगा तो अचानक दो घटनाएं हुईं। उनकी कंपनी के शेयर मुंह के बल गिरे और एक दिन संपादक की कुर्सी भी चली गई। इसी के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया का चरित्र भी बदला। रॉबर्ट नाइट लंदन लौट गए लेकिन कुछ ही समय में उन्हें लगा कि उनका कर्मक्षेत्र भारत ही है क्योंकि स्थितियां नहीं बदली थीं और वह अब भी मानते थे कि साम्राज्य (ब्रितानी) का काम स्थानीय लोगों के हित में काम करना है, उन्हें चूसकर गन्ने की खोई बना देना नहीं।
भारत लौटकर द टाइम्स ऑफ इंडिया शुरू करने के दस साल बाद रॉबर्ट नाइट ने एक नया अखबार निकालने का फैसला किया। इस सिलसिले में रॉबर्ट ने मद्रास से निकलने वाले और बंद हो चुके एक साप्ताहिक अखबार को खरीद लिया, जिसका नाम था द स्टेट्समैन। उन्होंने इसे बंबई से प्रकाशित करना शुरू किया। टाइम्स ऑफ इंडिया से बेदखल किए जाने के बाद रॉबर्ट नाइट के पास ज्यादा पैसे नहीं थे। जो पैसे थे, उसका एक बड़ा हिस्सा रॉबर्ट ने पहले ही एक नई साप्ताहिक पत्रिका इंडियन इकानामिस्ट निकालने में लगा दिया था। इस खस्ता हालत के बावजूद स्थितियों के प्रति उनका दृष्टिकोण नहीं बदला। उलटे अब उनके निशाने पर ब्रितानी सरकार और महारानी थीं। पत्रिका में प्रकाशित लेखों में रॉबर्ट ने महारानी के खर्चो को भारत के बजट में शामिल करने पर आपत्ति जताई और अफगानिस्तान अभियान के खर्चो को गलत बताया। इंडियन इकानामिस्ट के कई लेखों में रॉबर्ट नाइट ने रेल सेवा के विस्तार की तीखी आलोचना की। उनका तर्क था कि यह धनराशि सड़क बनाने और सिंचाई सुविधाएं मुहैया कराने पर खर्च करना बेहतर होता। एक और लेख में उन्होंने कहा कि ब्रितानी सरकार की सारी नीतियां और उसकी योजनाएं भ्रष्ट ब्रिटिश ठेकेदारों और ब्रितानी इस्पात उद्योग के हित में बनाई जाती हैं। उसमें जनता का हित कभी नहीं देखा जाता।

रॉबर्ट नाइट से नाराज लोगों की संख्या काफी थी पर बिना लाग-लपेट अपनी बात कहने के उनके ढंग के प्रशंसक भी कम नहीं थे। उनके एक शुभचिंतक सरकारी अधिकारी एलन आक्टेवियन ह्यूम थे, जिन्होंने बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ह्यूम ने रॉबर्ट नाइट का परिचय बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर जॉर्ज कैंपबेल से करा दिया। खतो किताबत के बाद कैंपबेल रॉबर्ट की मदद को राजी हो गए पर उनकी शर्त थी कि इंडियन इकानामिस्ट कलकत्ता से प्रकाशित हो। इसी के साथ साप्ताहिक एक तरह से ब्रितानी आधिकारिक प्रकाशन बन गया। उसकी प्रसार संख्या बढ़ी। इसी बीच रॉबर्ट की टिप्पणियों के चलते प्रशासन ने इंडियन इकानामिस्ट का प्रकाशन रोक दिया और उन्हें हटा दिया गया। रॉबर्ट ने इसके बाद भी हार नहीं मानी।
अपने परिवार को आगरा भेजने के बाद रॉबर्ट ने उन मित्रों से संपर्क किया जो उनकी अनुपस्थिति में बंबई से द स्टेट्समैन का बतौर साप्ताहिक लगातार प्रकाशन कर रहे थे। कुछ बातचीत और पैसे जुटाने पर रॉबर्ट ने द स्टेट्समैन को कलकत्ता लाने का निर्णय किया। शुरू में इसे साप्ताहिक रखा गया और कुछ साल बाद वह दैनिक हो गया। दैनिक ने अपनी भूमिका नहीं बदली। उसके पास संवाददाताओं का जाल था और आंकड़ों, तथ्यों के मामले में उससे बेहतर कोई अखबार नहीं था। जाहिर है, इसका असर हुआ और स्टेट्समैन मुनाफा कमाने वाला अखबार बन गया। रॉबर्ट नाइट 1890 में अपनी मृत्यु तक द स्टेट्समैन और भारतीय पत्रकारिता के प्रथम पुरुष बने रहे। दुर्भाग्य से रॉबर्ट पर अब तक कोई किताब नहीं थी। एडविन हर्शमान ने उन पर पहली किताब लिखी है। यह काफी नहीं है। भारतीय अंग्रेजी पत्रकारिता को समझने के लिए और तथ्य सामने लाने की जरूरत है और यह काम उसके महागुरुओं को जाने बिना संभव नहीं है।

Tuesday, November 17, 2009

पत्थर या लखौरी ईंटों से बनी दीवार

एक दीवार थी। उसमें एक खिड़की रहती थी। बकौल विनोद कुमार शुक्ल। लेकिन नहीं दिखती वह सबको। लगे रहे दिन भर। श्रीलंकाई भाई। ठोंकते-पीटते रहते। सीना-पसीना हो गए। कि मिल जाए खिड़की। द्रविड़ दीवार में। दाखिल हो सकें अंदर। द्रविड़ ने बंद कर दी खिड़की। चार तक गिनने के बाद। ताकि वहीं रुक जाए गिनती। समझ आ जाए सबको। मुहावरेदारी। दीवार की। पत्थर की। या लखौरी ईंटों से बनी। पुरानी। पर उतनी ही मजबूत। बल्कि पहले से कुछ अधिक आक्रामक। ऊपर से देखती दुनिया। ग्यारह हजार सीढ़ियां चढ़कर।

Friday, November 13, 2009

शायद सबसे लंबा इंतजार खत्म हुआ

शायद सबसे लंबा इंतजार। खत्म हुआ। मेट्रो पहुंची नोएडा। दिल्ली की शान का। शानदार विस्तार। कुछ हादसे। थोड़ी बहुत अफरा-तफरी। लेकिन लोगों का भरोसा। जमता गया। मेट्रो पर। सुविधा से। तय समय पर पहुंच सकते अब। द्वारका से नोएडा सेक्टर बत्तीस तक। यह इत्मीनान। बड़ी गनीमत। सड़कों के जाम। बस में सफर की। यातना-अपमान से। आहतों को राहत। हैरत यह कि सरकारें। नियामत और कयामत। देतीं साथ-साथ। असुविधाए, अचल-अपार। लेकिन सुविधाओं का भी विस्तार। बढ़ा दी महंगाई। साथ ही बढ़ाई। मेट्रो की लंबाई। सरकारजी आप धन्य! मेट्रो तो खैर! परम अनन्य!

Tuesday, November 10, 2009

कि आसमान से गिरें सफेद फूल

शुरू में अच्छा लगता है उसका आना। रहता है इंतजार। आसमानी तोहफे का। बच्चे-बड़े सब बेसब्र। कि आसमान से गिरें सफेद फूल। रूई के फाहों की तरह। उड़ते-उड़ते। बैठ जाएं यहां-वहां। दरख्तों पर। मोटरगाड़ियों, घरों पर। सिर पर। बस कुछ दिन। उसके बाद होने लगती है कोफ्त। रास्ते बंद। आना-जाना मुहाल। सर्दी। हाड़ कंपा देने वाली। घर से निकलना। ख्वाहिश के दायरे से बाहर। लेकिन यह सब बाद में। अभी तो आमद हुई है। ऊपर की चोटियों पर। पहले खुमार की तरह। तब उतरेगी। आहिस्ता-आहिस्ता।

Friday, November 6, 2009

इसलिए कि नीयत कांच की तरह साफ है

हिंदी में दो शब्द हैं। बिल्कुल आसपास की ध्वनि वाले। नियत और नियति। उर्दू जोड़ लें तो एक शब्द और। नीयत। इनके अर्थ भिन्न। प्रयोग जुदा। पर एक जगह तीनों एक साथ। नीयत ठीक। नियति पहले से ही नियत। यानी की तयशुदा। जैसे सचिन तेंदुलकर। क्रिकेट में महानता। वही नियति है। तय है। नियत है कि होना है एक दिन। इसलिए कि नीयत कांच की तरह साफ। न कोई खरोंच। न गंदगी। धूल-धक्कड़। बीस साल के अंतरराष्ट्रीय झंझावात में। सत्रहवें शिखर पर रहता। चमकता। बल्कि पहले से कुछ और ज्यादा दमकता।

Thursday, November 5, 2009

वेदों की बेदी पर

मधुकर उपाध्याय

भारत के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में व्यक्ति, समाज और सत्ता के बारे में की गयी तमाम टिप्पणियों की कई तरह से व्याख्या की गई है। एक टीकाकार का कहना है कि वेद अन्य बातों के साथ भारतीय समाज पर सटीक टिप्पणी करते हैं। वेद की ऋचाओ से यह ध्वनि बार-बार निकलती है कि कोई एक व्यक्ति, व्यवस्था या धर्म समाज के केन्द्र में नहीं है। एक अमेरिकी भारतविद् वेंडी डोनिगर का मानना है कि अगर समाज में कोई केन्द्र में नहीं है तो जाहिर है कि कोई हाशिए पर भी नहीं है। केन्द्र के बिना हाशिए की कल्पना नहीं की जा सकती। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि सभी केन्द्र में हैं और सभी हाशिए पर। ऐसे में दो अवधारणाएं बनती हैं-पहली कि भारत तमाम छोटे-छोटे केन्द्रों को मिलाकर बना है और जो एक जगह हाशिए पर है वही दूसरी जगह केन्द्र में है। दूसरी यह कि हर केन्द्र के हाशिए हैं पर उन सबकी रेखाएं एक दूसरे को काटती हैं, लिहाजा यह समझना आसान नहीं रह जाता कि असल केन्द्र कहां हैं।
दरअसल, यह अवधारणाएं उत्तर और दक्षिण भारत में थोड़े फर्क के साथ विकसित हुईं। दक्षिण ने वेदों का मूल स्वीकार करते हुए एक केन्द्र गढ़ने की कोशिश की ताकि समाज का ढांचा उसके इर्द-गिर्द बुना जा सके। यह समाज को बिखरने से बचाने और व्यवस्थित बनाने के लिए जरूरी था। ठीक-ठीक मालूम नहीं कि दक्षिण ने मंदिरों को समाज के केन्द्र में कब और कैसे रखा, लेकिन इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि उसने ऐसा क्यों किया। इसमें पहले मंदिर बने और धीरे-धीरे उसके चारों तरफ नगर बसने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस व्यवस्था में दिशाओं और विस्तार की अपार संभावनाएं थीं। उत्तर भारत में समाज और नगरों का निर्माण नदियों के किनारे हुआ और उसने मंदिरों की जगह नदियों को केन्द्र माना। नदी का प्रवाहमान स्वरूप और उसका टेढ़े मेढ़े चलकर अपनी राह बनाना कालांतर में समाज की प्रवृत्ति में शामिल हो गया। दक्षिण के समाज में व्यवस्था और उत्तर में लगभग अराजकता का इससे संबंध हो सकता है।
दोनों मामलों को समाज के दूसरे पहलुओं पर भी लागू किया जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी को केन्द्र न मानने की मौलिक वैदिक सोच और समाज तथा नगर की रचना के लिए केन्द्र गढ़ने की अनिवार्यता को अलग-अलग समझा जा सकता है। इनमें कहीं घालमेल दिखाई नहीं देता। बहुत बाद में जब सत्ता के केन्द्र बनने शुरू हुए तो समाज और सत्ता दोनों की भूमिका बराबर महत्व की बनी रही। किसी भी सभ्य में समाज यह माना जाएगा कि सत्ता का मूल आधार समाज ही है और उससे कटकर या अलग होकर सत्ता नहीं चल सकती। यानी कि यहां भी केन्द्र एक से अधिक हैं और न कोई केन्द्र में है, न ही कोई हाशिए पर। सत्ता की निश्चित भूमिकाएं हैं और उसकी नकेल समाज के पास है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में यह काम चुनाव के जरिए होता है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि समाज सत्ता के रास्ते में हर पल रोड़े अटकाता रहे और उसे काम करने की छूट न दे। लगभग उसी तरह जसे कोई किसी को पहली मंजिल पर एक कमरा किराए पर दे और उसके बाद सीढ़ियां हटा ले। या फिर ऐसी पाबंदी लगा दे कि किराएदार सीढ़ियों का इस्तेमाल नहीं करेगा; सीढ़ियों का उपयोग करने पर हर बार वह लिखित स्पष्टीकरण देगा कि उसने ऐसा क्यों किया। जाहिर है यह संभव नहीं है।
इस समय करीब-करीब ऐसा ही एक विवाद उभरने लगा है। मामला मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति का है, जो पद वजाहत हबीबुल्लाह के हटने से खाली हुआ है। इस पद पर नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास है, जिसे समाज ने चुना है। समाज के एक प्रभावशाली वर्ग ने अचानक यह मांग शुरू कर दी कि पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया जाए। इनफोसिस के नारायण मूर्ति, अभिनेता आमिर खान और योग गुरु रामदेव ने प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी और कहा कि अगर किरण बेदी को इस पद पर नियुक्त नहीं किया जा रहा है तो सरकार स्पष्टीकरण दे कि उसने जिस किसी को भी चुना है, उसका आधार क्या है, वह किरण बेदी से बेहतर कैसे है। निश्चित रूप से समाज ने इस मामले में अपनी भूमिका का अतिक्रमण किया है और ऐसे क्षेत्र में दखल देने की कोशिश की है, जिसकी जिम्मेदारी खुद उसने अपनी चुनी हुई सरकार को दे रखी है। इस तर्क को हास्यास्पद रूप से खींचकर यहां तक भी ले जाया जा सकता है कि समाज तय करे कि सरकार में मंत्री कौन होंगे या प्रधानमंत्री कौन होगा।
दरअसल, यह भारत की मूल संरचना को समझने में हुयी चूक का नतीजा है। यह मानने का परिणाम है कि व्यवस्था में कोई केन्द्र में है और कोई हाशिए पर। व्यक्ति को संस्था से ज्यादा महत्वपूर्ण समझने की गलती है। संस्थाएं, व्यक्ति और समाज से बनती हैं लेकिन उनका अपना जीवन भी होता है। उस पर इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि उस संस्था की कुर्सी किसके पास है। चुनाव आयोग में कभी टीएन शेषन बहुत महत्वपूर्ण लगते थे पर अंतत: संस्था बड़ी साबित हुई। नवीन चावला के विवाद से भी संस्था की केन्द्रीय भूमिका क्षतिग्रस्त नहीं हुई। यह बात मुख्य सूचना आयुक्त के मामले में भी इतनी ही सच साबित होगी।