Thursday, November 5, 2009

वेदों की बेदी पर

मधुकर उपाध्याय

भारत के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों में व्यक्ति, समाज और सत्ता के बारे में की गयी तमाम टिप्पणियों की कई तरह से व्याख्या की गई है। एक टीकाकार का कहना है कि वेद अन्य बातों के साथ भारतीय समाज पर सटीक टिप्पणी करते हैं। वेद की ऋचाओ से यह ध्वनि बार-बार निकलती है कि कोई एक व्यक्ति, व्यवस्था या धर्म समाज के केन्द्र में नहीं है। एक अमेरिकी भारतविद् वेंडी डोनिगर का मानना है कि अगर समाज में कोई केन्द्र में नहीं है तो जाहिर है कि कोई हाशिए पर भी नहीं है। केन्द्र के बिना हाशिए की कल्पना नहीं की जा सकती। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि सभी केन्द्र में हैं और सभी हाशिए पर। ऐसे में दो अवधारणाएं बनती हैं-पहली कि भारत तमाम छोटे-छोटे केन्द्रों को मिलाकर बना है और जो एक जगह हाशिए पर है वही दूसरी जगह केन्द्र में है। दूसरी यह कि हर केन्द्र के हाशिए हैं पर उन सबकी रेखाएं एक दूसरे को काटती हैं, लिहाजा यह समझना आसान नहीं रह जाता कि असल केन्द्र कहां हैं।
दरअसल, यह अवधारणाएं उत्तर और दक्षिण भारत में थोड़े फर्क के साथ विकसित हुईं। दक्षिण ने वेदों का मूल स्वीकार करते हुए एक केन्द्र गढ़ने की कोशिश की ताकि समाज का ढांचा उसके इर्द-गिर्द बुना जा सके। यह समाज को बिखरने से बचाने और व्यवस्थित बनाने के लिए जरूरी था। ठीक-ठीक मालूम नहीं कि दक्षिण ने मंदिरों को समाज के केन्द्र में कब और कैसे रखा, लेकिन इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि उसने ऐसा क्यों किया। इसमें पहले मंदिर बने और धीरे-धीरे उसके चारों तरफ नगर बसने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस व्यवस्था में दिशाओं और विस्तार की अपार संभावनाएं थीं। उत्तर भारत में समाज और नगरों का निर्माण नदियों के किनारे हुआ और उसने मंदिरों की जगह नदियों को केन्द्र माना। नदी का प्रवाहमान स्वरूप और उसका टेढ़े मेढ़े चलकर अपनी राह बनाना कालांतर में समाज की प्रवृत्ति में शामिल हो गया। दक्षिण के समाज में व्यवस्था और उत्तर में लगभग अराजकता का इससे संबंध हो सकता है।
दोनों मामलों को समाज के दूसरे पहलुओं पर भी लागू किया जा सकता है। उदाहरण के लिए किसी को केन्द्र न मानने की मौलिक वैदिक सोच और समाज तथा नगर की रचना के लिए केन्द्र गढ़ने की अनिवार्यता को अलग-अलग समझा जा सकता है। इनमें कहीं घालमेल दिखाई नहीं देता। बहुत बाद में जब सत्ता के केन्द्र बनने शुरू हुए तो समाज और सत्ता दोनों की भूमिका बराबर महत्व की बनी रही। किसी भी सभ्य में समाज यह माना जाएगा कि सत्ता का मूल आधार समाज ही है और उससे कटकर या अलग होकर सत्ता नहीं चल सकती। यानी कि यहां भी केन्द्र एक से अधिक हैं और न कोई केन्द्र में है, न ही कोई हाशिए पर। सत्ता की निश्चित भूमिकाएं हैं और उसकी नकेल समाज के पास है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में यह काम चुनाव के जरिए होता है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि समाज सत्ता के रास्ते में हर पल रोड़े अटकाता रहे और उसे काम करने की छूट न दे। लगभग उसी तरह जसे कोई किसी को पहली मंजिल पर एक कमरा किराए पर दे और उसके बाद सीढ़ियां हटा ले। या फिर ऐसी पाबंदी लगा दे कि किराएदार सीढ़ियों का इस्तेमाल नहीं करेगा; सीढ़ियों का उपयोग करने पर हर बार वह लिखित स्पष्टीकरण देगा कि उसने ऐसा क्यों किया। जाहिर है यह संभव नहीं है।
इस समय करीब-करीब ऐसा ही एक विवाद उभरने लगा है। मामला मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति का है, जो पद वजाहत हबीबुल्लाह के हटने से खाली हुआ है। इस पद पर नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास है, जिसे समाज ने चुना है। समाज के एक प्रभावशाली वर्ग ने अचानक यह मांग शुरू कर दी कि पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया जाए। इनफोसिस के नारायण मूर्ति, अभिनेता आमिर खान और योग गुरु रामदेव ने प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी और कहा कि अगर किरण बेदी को इस पद पर नियुक्त नहीं किया जा रहा है तो सरकार स्पष्टीकरण दे कि उसने जिस किसी को भी चुना है, उसका आधार क्या है, वह किरण बेदी से बेहतर कैसे है। निश्चित रूप से समाज ने इस मामले में अपनी भूमिका का अतिक्रमण किया है और ऐसे क्षेत्र में दखल देने की कोशिश की है, जिसकी जिम्मेदारी खुद उसने अपनी चुनी हुई सरकार को दे रखी है। इस तर्क को हास्यास्पद रूप से खींचकर यहां तक भी ले जाया जा सकता है कि समाज तय करे कि सरकार में मंत्री कौन होंगे या प्रधानमंत्री कौन होगा।
दरअसल, यह भारत की मूल संरचना को समझने में हुयी चूक का नतीजा है। यह मानने का परिणाम है कि व्यवस्था में कोई केन्द्र में है और कोई हाशिए पर। व्यक्ति को संस्था से ज्यादा महत्वपूर्ण समझने की गलती है। संस्थाएं, व्यक्ति और समाज से बनती हैं लेकिन उनका अपना जीवन भी होता है। उस पर इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि उस संस्था की कुर्सी किसके पास है। चुनाव आयोग में कभी टीएन शेषन बहुत महत्वपूर्ण लगते थे पर अंतत: संस्था बड़ी साबित हुई। नवीन चावला के विवाद से भी संस्था की केन्द्रीय भूमिका क्षतिग्रस्त नहीं हुई। यह बात मुख्य सूचना आयुक्त के मामले में भी इतनी ही सच साबित होगी।

1 comment:

खुशदीप सहगल said...

मधुकर जी,
नोबल विजेता अमर्त्य सेन ने 1991 में एक शोध-पत्र प्रस्तुत किया था-The Argumentative Indians,इसमें उन्होंने तथ्यों के साथ सुंदर विवेचना की थी कि आज़ादी के बाद भारतीयों ने और कुछ सीखा हो या न सीखा हो, तर्क करना बड़े अच्छे ढंग से सीख लिया है...हर सही-गलत बात पर हम अपनी ही सोच को सही साबित करना चाहते हैं...इसके लिए तर्क-कुतर्क सभी का प्रयोग करते हैं...मीडिया ट्रायल भी ऐसी ही एक ग्रंथि है...आपने केंद्र और हाशिए का उदाहरण देकर बड़े सुंदर ढंग से इस विसंगति को समझाया है...अगर व्यक्ति को संस्था से ऊपर मानते हुए लोकतंत्र के स्तंभ एक दूसरे के कार्य में यूंही अतिक्रमण की कोशिश करते रहेंगे तो अराजकता तो होगी ही होगी...बेहतर यही होगा कि हम सब जिस स्तंभ से भी जुड़े हैं, उसी में ईमानदारी से अपना योगदान दें...मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति सरकार का काम है, सरकार पर ही छोड़ देना चाहिए...

आपसे बड़े दिनों बाद संवाद कर बड़ा अच्छा लग रहा है...

जय हिंद...