Monday, June 16, 2008

प्रेम पवित्र है


प्रेम पवित्र है। शाश्वत है। निश्छल और स्वतंत्र। हर तरह के बंधन से मुक्त। उससे ऊपर। उसे पसंद नहीं कि कोई रोक-टोक हो। अपने आप में पूर्ण। भावना में। अभिव्यक्ति में। अपना रास्ता खुद तय करता है। वह मुहावरेदारी से भी ऊपर है। उम्र, जाति, रंग, धर्म-कुछ नहीं मानता। वजन भी। वह जिसे प्रेम के काबिल समझता है, बस आ जाता है। भले आपका वजन कुछ भी हो। आप दुनिया के सबसे भारी-भरकम आदमी हों। जो प्रेम को पढ़ सकता है, अनपढ़ नहीं हो सकता। उसके ढाई आखर सब मोटी पोथियों पर भारी पड़ेंगे।

2 comments:

Udan Tashtari said...

सहमत हूँ..आपसे.

भुवनेश शर्मा said...

सही लिखा है जी