Sunday, July 27, 2008

कब जागेगी सरकार

ऐसा पहली बार हुआ है कि दो राज्यों कर्नाटक और गुजरात में एक के बाद एक सीरियल धमाके हुए। शुक्रवार को बेंगलुरु, शनिवार को अहमदाबाद। दोनों अपने राज्यों की राजधानियां। दोनों महानगर। दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार। इससे दो महीने पहले मई में राजस्थान की राजधानी जयपुर में सीरियल धमाके हुए थे और संयोग से वहां भी भाजपा सरकार है। लेकिन फिलहाल जिक्र बेंगलुरु और अहमदाबाद का। दोनों स्थानों पर सीरियल विस्फोट। बेंगलुरु में नौ, अहमदाबाद में सत्रह। दोनों जगह कम शक्ति के बमों का इस्तेमाल।यह सवाल उठ सकता है कि आखिर आतंकवादी क्या करना या कहना चाह रहे हैं। क्या आतंकवादियों का इरादा तबाही मचाने से ज्यादा कुछ और है। जयपुर के बरक्स क्या वे कम ताकत के बमों का प्रयोग करके जानमाल को नुकसान पहुंचाने की जगह कोई और इशारा कर रहे हैं। क्या आने वाले दिनों में उनका इरादा किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने का है। यह सारे सवाल बेमानी हैं। इनका कोई अर्थ नहीं है। आतंकवादियों के इरादे साफ हैं। उनका पहला निशाना भारत का सिलिकान शहर बेंगलुरु था, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की नई जीवनरेखा है। यह हमला उसे क्षत-विक्षत करने के लिए था। दूसरा ठिकाना सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील पुराना अहमदाबाद बना। जाहिर है, आतंकवादी भारतीय अर्थव्यवस्था और सांप्रदायिक सद्भाव को निशाना बना रहे हैं। जयपुर और लखनऊ की तरह अहमदाबाद में भी बम रखने के लिए साइकिल और टिफिन बाक्स का प्रयोग किया गया। आतंकवादियों की ताजा सक्रियता की वजह उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई न होना है। इस स्थिति में सरकार से दोहरी सक्रियता अपेक्षित है। आतंकवादियों और उनके स्लीपर सेल माड्यूल पर कड़ी कार्रवाई और सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना। लोगों ने आतंक का अपने ढंग से हर बार जवाब दिया है। इस बार भी देंगे। सरकार को उनके साथ खड़ा होना होगा। ट़ुच्ची राजनीतिक मानसिकता से ऊपर उठकर सोचना होगा। लोग आतंक के नतीजों से निपट लेंगे पर आतंक से निपटने का मुख्य जिम्मा सरकार का है।

1 comment:

siddharth said...

अभी एक अखबार ने अहमदाबाद विस्फोटों के अगले दिन उत्तर प्रदेश के कई शहरों में पुलिस सतर्कता और सावधानी व नागरिकों की जागरूकता का जायजा लेने के लिए नकली बम साइकिलों में लटकाकर अनेक सार्वजनिक स्थलों पर खड़े कराए। ये साइकिलें घण्टों लावारिस खड़ी रहीं लेकिन न तो किसी पुलिस वाले ने इसकी सुधि ली और न ही किसी आम नागरिक की निगाह उनपर गयी। यह उस दिन हुआ जिस दिन आतंकवादियॊं के अगले हमले की आशंका सबको थी।
जब हम इतने लापरवाह हो सकते हैं तो हमारी vulnerability में कोई संदेह कैसा?