Wednesday, July 2, 2008

'द प्राफेट' : अलमुस्तफा उसका नाम था

खलील जिब्रान का व्यक्तित्व करिश्माई था। वे अरबी, अंगरेजी फारसी के ज्ञाता, दार्शनिक और चित्रकार भी थे। उन्हें अपने चिंतन के कारण जाति से बहिष्कृत कर देश निकाला तक दे दिया गया था। उनका जन्म लेबनान के 'बथरी' नगर में हुआ था। उनमें अद्भुत कल्पना शक्ति थी। खलील जिब्रान की पुस्तक 'द प्राफेट' का दुनिया की 132 भाषाओं में अनुवाद हुआ है। मैंने भी इस पुस्तक की हिंदी में पुनर्रचना की है। और उसे अपनी आवाज दी। उस आडियो कैसेट को तो आपमें से बहुतो ने सुना होगा। पर जिन्होंने उसे नहीं सुना उनके लिए वह अमर रचनाएं पेश कर रहा हूं। यह आडियो कैसेट 13 भागों में है। इसका हर भाग आपको समय-समय पर पढ़ने को मिलेगा। हम आपको अल मुस्तफा की कुछ दुर्लभ पेंटिंग्स भी समय-समय पर उपलब्ध कराएंगे।

पहला भाग :

लमुस्तफा उसका नाम था। बारह बरस तक उसने आरफलीज नगर में उस जहाज का इंतजार किया था, जो उसे अपनी जन्मभूमि की तरफ ले जाने वाला था। शहर के बाहर की टीकरी पर वो रोज समुंदर की ओर देखता था। और उस दिन इलूल महीने की सातवीं तारीख को जब फसल काटने के दिन थे। उसे अपना जहाज कोहरे के साथ आता नजर आया। उसके दिल के दरवाजे खुल गए और उसकी खुशी पंख फड़फड़ाकर समुंदर में दूर तक फैल गई। फिर उसने आंखें बंद की और अनंत शांति में डूबकर इबादत की। जब अलमुस्तफा टीकरी से नीचे उतर रहा था, तो उस पर उदासी के बादल छा गए। वो सोचने लगा कि मैं यहां से कैसे जा सकूंगा। बिना दुख महसूस किए, बिना अपने ज़ज्बात पर घाव सहे। जहाज बंदरगाह के बेहद करीब पहुंच गया था। उसने देखा। और जैसे ही वो मुड़ा सामने दूर-दूर तक लोग नजर आ रहे थे। उसी की ओर बढ़ते हुए। वे उसी का नाम भी ले रहे थे। सबका कहना था कि उसे शहर छोड़ कर नहीं जाना चाहिए। लोगों ने मनुहार की। उसे अपना लाड़ला बेटा कहा। चिरौरी, विनती की। पर उसने कोई जवाब नहीं दिया। सिर झुका लिया। जो पास खड़े थे उन्होंने उसकी छाती पर टपकते आंसू देखे। तभी शहर की इबादतगाह से एक औरत बाहर आई। उसका नाम था अलमित्रा। उसने कहा, तुम प्रभु के पैगंबर हो। अब तुम्हारा जहाज आ पहुंचा है और तुम्हारा जाना जरूरी है। तो जाओ। हमारा प्रेम तुम्हारा बंधन नहीं बनेगा। फिर भी हम तुमसे प्रार्थना करते हैं, कि जाने से पहले तुम सच के अपने भंडार में से हमें कुछ दे जाओ। जो हम अपनी संतानों को देंगे। और वे अपनी संतानों को। और वो अमर रहेगा। जीवन और मौत के बीच में जो भी है। और उसके बारे में जो भी तुम जानते हो। हमें बताओ। फिर लोगों ने प्रेम, विवाह, बच्चे, दुख, खुशी, घर, कपड़े, कानून, समय, सुंदरता भलाई-बुराई, इबादत, धर्म और मौत और न जाने किन-किन विषयों पर उससे सवालात किए। अलमुस्तफा ने एक-एक करके सबको जवाब दिया।

2 comments:

Udan Tashtari said...

इस कार्य हेतु आपका साधुवाद. कभी कभी कुछ आडियो क्लिपिंग भी सुनवाये तो आनन्द कई गुना बढ़ जायेगा. आभार आपका इस बेहतरीन भावानुवाद के लिए.

meenakshi said...

i have heard the audio of al-mushtafa its amazing . Madhukar jee should put it online so that others can listen to it.